क़ुरबानी की मालूमात Benefits Of Qurbani In Islam In Hindi

Benefits Of Qurbani In Islam In Hindi - क़ुरबानी इस्लाम में पांच फ़र्ज़ में से एक फ़र्ज़ हैं और इसका करना बहुत जरुरी हैं पर क़ुरबानी हर गरीब मोमिन के बस की

क़ुरबानी की मालूमात benefits of qurbani in islam in Hindi

Benefits Of Qurbani In Islam In Hindi
Benefits Of Qurbani In Islam In Hindi


Benefits Of Qurbani In Islam In Hindi - क़ुरबानी इस्लाम में पांच फ़र्ज़ में से एक फ़र्ज़ हैं और इसका करना  बहुत जरुरी हैं पर क़ुरबानी हर गरीब मोमिन के बस की बात नहीं इसे वही कर सकता हैं जो क़ुरबानी करने की हैशियत हो जिसके पास इतना माल ओ दौलत हो जो इसे कर सके 

कुरबानी हुक्मे खुदावन्दी पर अमल करने के लिये की जाती है / Benefits Of Qurbani In Islam


सुवाल : हम कुरबानी क्यूं करते हैं ? / Importance Of Animal Sacrifice In Islam

जवाब : कुरबानी Qurbani का हुक्म अल्लाह पाक और उस के प्यारे रसूल  ने दिया है और येह चन्द शराइत के साथ मुसल्मान पर वाजिब होती है इस लिये हम कुरबानी करते हैं और करते रहेंगे । अल्लाह पाक ने कुरबानी का हुक्म देते हुए कुरआने करीम में इर्शाद फ़रमाया 

तरजमए कन्जुल ईमान :

" तो तुम अपने रब के लिये नमाज़ पढ़ो और कुरबानी Qurbani करो । " तो इस हुक्मे खुदावन्दी पर अमल करने के लिये हम कुरबानी करते हैं । ( इस मौक पर मदनी मुज़ाकरे में शरीक मुफ्ती साहिब ने फ़रमाया :) इस आयते मुबारका में भी कुरबानी का ज़िक्र है 


तरजमए कन्जुल ईमान : “ तुम फ़रमाओ बेशक मेरी नमाज़ और मेरी कुरबानियां और मेरा जीना और मेरा मरना सब अल्लाह के लिये है जो रब सारे जहान का । " इसी तरह जब नबिय्ये करीम की बारगाह में सहाबए किराम ने अर्ज की , कि येह कुरबानियां क्या हैं ? तो आप ने इर्शाद फ़रमाया :: ( या'नी कुरबानी करना ) तुम्हारे बाप इब्राहीम का तरीकाए कार है । एक और हदीसे पाक में है : जो कुरबानी की वुस्अत रखता हो और कुरबानी न करे तो वोह हमारी ईदगाह के क़रीब न आए ।  



कुरबानी किस पर वाजिब है ? / Who Is Qurbani Compulsory On 

सुवाल : कुरबानी करना किस पर वाजिब है ? 

जवाब : 10 जुल हिज्जतिल हराम की सुब्हे सादिक़ से ले कर 12 जुल हिज्जतिल हराम के गुरूबे आफ्ताब के दरमियान अगर कोई मुसल्मान आकिल , बालिग , मुकीम और साहिबे निसाब हो और वोह निसाब उस के कर्ज़ और ज़रूरिय्याते ज़िन्दगी में मुस्तररक ( या'नी डूबा हुवा ) न हो तो इस सूरत में कुरबानी वाजिब होगी । 


क्या मुसाफ़िर पर कुरबानी वाजिब है ? / Benefits Of Qurbani In Islam In Hindi

सुवाल : क्या मुसाफ़िर पर कुरबानी वाजिब है ? 

जवाब : जो शर्जन मुसाफ़िर है उस पर कुरबानी वाजिब नहीं ।


कुरबानी के जानवर की उम्र का ए'तिबार है या दांत निकालने का ? 

सुवाल : क्या ऐसे जानवर की कुरबानी जाइज़ है जो अपनी कुरबानी की उम्र पूरी कर चुका हो मगर उस ने दांत न निकाले हों ? बक़रह ईद के मौक़ पर ब्योपारी गाहकों से कहते हैं कि हमारे इस जानवर ने अगर्चे दांत नहीं निकाले मगर येह अपनी कुरबानी Qurbani की उम्र पूरी कर चुका है तो गाहक वोह जानवर खरीदने के लिये तय्यार नहीं होते और कहते हैं कि दांत निकालना ज़रूरी है , अगर वोही जानवर ब्योपारी आधी कीमत पर देने के लिये तय्यार हो जाए तो गाहक उसे ख़रीद लेते हैं , उन का ऐसा करना कैसा ? 

जवाब : जो जानवर कुरबानी की उम्र पूरी कर चुके हों उन की कुरबानी जाइज़ है अगर्चे उन्हों ने दांत न निकाले हों । कुरबानी के जाइज़ होने के लिये ऊंट की उम्र कम अज़ कम पांच साल , भैंस की दो साल और बकरा , बकरी , दुम्बा , दुम्बी और भेड़ की एक साल होना ज़रूरी है । 

अलबत्ता अगर दुम्बा या भेड़ का छे महीने का बच्चा इतना बड़ा हो कि दूर से देखने में साल भर का मालूम होता हो तो उस की कुरबानी भी जाइज़ है । याद रखिये ! कुरबानी जाइज़ होने के लिये जानवरों की उम्र पूरी होना ज़रूरी है न कि दांत निकालना क्यूं कि जो जानवर आज़ाद घूम फिर कर चरते और नोच नोच कर घास खाते हैं 

वोह मुसल्सल दांतों से घास खींचते रहने के सबब अपनी कुरबानी की उम्र पूरी होने से पहले ही दांत निकाल देते हैं और जो जानवर बंधे हुए होते हैं वोह बसा अवकात उम्र पूरी होने के बा वुजूद दांत नहीं निकाल पाते । जानवरों की उम्र के मुआमले में लोग ब्योपारियों पर इस लिये ए'तिमाद नहीं करते कि कसरत से झूट और धोका देही के बाइस उन का ब्योपारियों से ए'तिमाद उठ चुका होता है । 

बा'ज़ ब्योपारी जानवरों की कटी हुई दुम टेप लगा कर जोड़ देते हैं और जिस रंग के जानवर के बाल होते हैं टेप पर उसी तरह का रंग लगा देते हैं जिस के बाइस ख़रीदार को येह मालूम नहीं हो पाता कि जानवर की दुम कटी हुई है और फिर जब वोह बेचारा उसे घर ले जा कर दुम से पकड़ता है तो दुम निकल कर उस के हाथ में आ जाती है । इसी तरह बा'ज़ ब्योपारी जानवरों के दांत दिखाते हुए भी धोका देही से काम लेते हैं । 

अगर्चे सब ब्योपारी धोकेबाज़ नहीं होते मगर लोग ईमानदार ब्योपारियों पर भी इस लिये ए'तिमाद नहीं करते कि दूध का जला छाछ फूंक फूंक कर पीता है । अगर ब्योपारी बा शर्डी और नेक आदमी है और वोह कहता है कि जानवर की उम्र पूरी है , गाहक को उस पर ए'तिमाद है कि वोह जानवर की उम्र बताने में झूट नहीं बोल रहा तो इस सूरत में अगर गाहक ने उस से जानवर ख़रीद कर कुरबानी कर ली तो उस की कुरबानी हो जाएगी अगर्चे दांत न निकले हों । 

बेहतर येह है कि कुरबानी का जानवर चाहे वोह भैंस हो या बकरा चार दांत का होना चाहिये , बकरा अगर चार दांत का हो तो उस का गोश्त उम्दा होता है मगर हमारे यहां दो दांत की रस्म चल पड़ी है । जानवर खरीदने वाले भी दो दांत का मुतालबा करते हैं और ब्योपारी भी दो दांत की सदाएं लगाते हैं । 

बसा अवकात जानवर आठ दांत ( या'नी बड़ी उम्र ) का होता है मगर ब्योपारी ख़रीदार को सिर्फ दो दांत नुमायां तौर पर दिखाते हैं और बकिय्या दांत अपनी उंग्लियों से छुपा लेते हैं और फिर फ़ौरन जानवर का मुंह बन्द कर देते हैं । 

रही बात येह कि जिस जानवर के कम उम्री की वज्ह से दांत नहीं निकले होते लोग उसे आधी कीमत में खरीद लेते हैं तो येह आधी कीमत पर खरीदने वाले शायद गोश्त फ़रोश होते होंगे जो ऐसे जानवरों को कुरबानी Qurbani के लिये नहीं बल्कि ज़ब्ह कर के उन का गोश्त बेचने के लिये ख़रीद लेते होंगे । 


जानवर दो दांत का है या ज़ियादा का , येह पहचान कैसे हो ? 

सुवाल : जानवर दो दांत का है या ज़ियादा का , इस की पहचान कैसे की जा सकती है ? 

जवाब : जानवर दो दांत का है या ज़ियादा का , इस की पहचान येह है कि जो दांत अच्छी तरह नहीं निकले होते वोह सारे छोटे से एक लाइन में सफेदी की तरह नज़र आते हैं और जो दांत निकल चुके होते हैं वोह उस सफ़ेदी से थोड़ा हट कर उभरी हुई जगह से निकलते हैं और चौड़े होते हैं 

और उन पर कुछ पीलाहट सी होती है । अगर जानवर आठ दांत का बिल्कुल ज़ईफ़ है तो उस के आठों दांत एक ही लाइन में नज़र आएंगे और उन पर पीलाहट भी दिखाई देगी । 

बहर हाल जानवर के दांतों की पहचान हर एक नहीं कर सकता लिहाज़ा जानवर खरीदते वक्त तजरिबा कार आदमी का साथ होना बहुत मुफीद है । 


बड़े जानवरों को छोटी गाड़ियों में घुसा कर लाना कैसा ?  Benefits Of Qurbani In Islam In Hindi

सुवाल : कुरबानी के जानवरों को मन्डी से खरीद कर घर लाने के लिये गाड़ियों की ज़रूरत पड़ती है , बा'ज़ लोग पैसे बचाने के लिये बड़े जानवरों को भी छोटी गाड़ियों में जबर दस्ती घुसा कर , लिटा कर और रस्सियों से बांध कर लाते हैं जिस की वज्ह से जानवरों को बहुत तक्लीफ़ होती है और बसा अवक़ात वोह शदीद ज़ख्मी भी हो जाते हैं इस बारे में कुछ मदनी फूल इर्शाद फ़रमा दीजिये ।

जवाब : जिस तरह इन्सान को तक्लीफ़ देह चीज़ों से अज़िय्यत पहुंचती है और वोह अपने आप को उन से बचाने की कोशिश करता है ज़ाहिर है इसी तरह जानवरों को भी तक्लीफ़ देह चीज़ों से अज़िय्यत होती है । 

चन्द पैसों की ख़ातिर इस तरह बड़े जानवरों को छोटी गाड़ियों में जबर दस्ती घुसा कर , लिटा कर और रस्सियों से बांध कर लाना बिला वज्ह जानवरों को ईज़ा देना और उन पर जुल्म करना है । जानवर पर जुल्म करना मुसल्मान पर जुल्म करने से भी सख़्त तर है 

क्यूं कि मुसल्मान तो मुकाबला करेगा , अदालत में जा कर केस कर देगा इस के इलावा और बहुत कुछ कर सकता है । लेकिन येह बे ज़बान जानवर किस के आगे फ़रियाद करेगा । याद रखिये ! मज़लूम जानवर बल्कि मज़लूम काफ़िर की भी बद दुआ कबूल होती है । 

जिन्हों ने ऐसा किया है वोह तौबा करें और आयिन्दा हरगिज़ इस तरह के अन्दाज़ इख़्तियार न करें । 



कौन से दिन कुरबानी करना अफ़ज़ल है ? Which Day  importance of qurbani? 

सुवाल : ईद के कौन से दिन कुरबानी करना अफ़ज़ल है ? 

जवाब : ईद के तीन दिन कुरबानी करना जाइज़ है अलबत्ता पहले दिन कुरबानी करना अफ़ज़ल है । ईद के पहले दिन उमूमन कस्साब ज़ियादा पैसे लेते हैं तो बा'ज़ लोग थोड़े से पैसे बचाने के लिये अफ़ज़ल अमल को छोड़ कर ईद के दूसरे या तीसरे दिन कुरबानी करते हैं । 

यूं चन्द पैसों की खातिर इतना महंगा जानवर लाने के बा वुजूद पहले दिन कुरबानी करने की फ़ज़ीलत पाने से खुद को महरूम कर देते हैं । पहले दिन क़स्साब का ज़ियादा रकम लेना अगर्चे नफ्स पर गिरां गुज़रता है मगर हमें अपना यूं ज़ेह्न बनाना चाहिये कि जो नेक अमल नफ्स पर जितना ज़ियादा गिरां गुज़रता है 

उस का सवाब भी उतना ही ज़ियादा अता किया जाता है । ( सफ़रे हज की एहतियातें , स . 24 ) 

याद रखिये ! ईदुल अज़्हा के दिन जानवर ज़ब्ह करने से अफ़ज़ल कोई अमल नहीं है । लिहाज़ा कोई मजबूरी न हो तो पहले दिन ही कुरबानी की जाए अगर्चे कुछ रकम ज़ियादा खर्च होगी लेकिन इस को नुक्सान न समझा जाए बल्कि इस के इवज़ आख़िरत में मिलने वाले अज़ीम सवाब पर नज़र रखी जाए । 

अगर किसी के घर में दूसरे या तीसरे दिन दा'वत होती इस वज्ह से वोह पहले दिन कुरबानी नहीं करता तो उसे चाहिये कि पहले दिन कुरबानी कर के उस का गोश्त फ्रीज में रख दे और अगले दिन दा'वत में इस्ति'माल कर ले क्यूं कि एक दो दिन में गोश्त के ज़ाएके में कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता । 

फ़क़त लज्जते नफ्स के लिये पहले दिन कुरबानी के अज़ीम सवाब से महरूम हो जाना दानि । हो जाना दानिश मन्दी नहीं बल्कि महरूमी है । जिस तरह ताजिर माल के नफ्अ पर नज़र रखता है इसी तरह हर मुसल्मान को चाहिये कि वोह माल के नफ्अ से ज़ियादा नेकियों के नफ्अ पर नज़र रखे और इस के लिये कोशिश भी करता रहे । 


शिकन्जे में जकड़ कर जानवर ज़ब्द करना कैसा ? 

सुवाल : यूरोपियन ( European ) ममालिक में छोटे जानवर को ज़ब्द करने के लिये मख्सूस शिकन्जे में जकड़ा जाता है ताकि रस्सियों से बांधने और पकड़ने की मशक्कत से बचा जा सके , ऐसा करना कैसा है ? 

जवाब : बकरे और दुम्बे वगैरा को मख्सूस शिकन्जे में जकड़ कर ज़ब्ह करने में और तो कोई हरज नहीं लेकिन एक सुन्नत तर्क हो जाती है वोह येह कि ज़ब्ह करने वाला अपना दायां ( या'नी सीधा ) पाउं जानवर की गरदन के दाएं ( या'नी सीधे ) हिस्से ( या'नी गरदन के करीब पहलू ) पर रखे और ज़ब्ह करे । 

अलबत्ता इस शिकन्जे के जरीए जकड़ने में एक फ़ाएदा भी है कि जानवर कई गैर ज़रूरी तकालीफ़ से बच जाता है मसलन बा'ज़ लोग बकरे को उठा कर पटख्ने हैं या पथरीली ज़मीन पर गिराते हैं जो यक़ीनन बिला वज्ह की ईज़ा है 

लेकिन इस मख्सूस शिकन्जे के जरीए लिटाने में येह दोनों तकालीफ़ नहीं होंगी । नीज़ इस शिकन्जे की हैअत ऐसी है कि जानवर को लिटा कर पेट से जकड़ लिया जाता है और पाउं आज़ाद होते हैं तो येह तिब्बी लिहाज़ से भी अच्छा है 

इस लिये कि जानवर जितना ज़ियादा हाथ पाउं मारेगा उतना ही मुज़िर्रे सिहहुत खून बह जाएगा । बहर हाल शिकन्जे में कस कर जब्ह करें या रस्सियों से बांध कर , जानवर को बेजा तक्लीफ़ देने की हरगिज़ इजाजत नहीं । जो लोग बकरे की गरदन चटखा देते हैं 

या बड़े जानवर की छुरा घोंप कर दिल की रगें काट देते हैं या ज़ब्ह करते हुए हड्डी पर छुरी मारते हैं तो उन्हें इस से बचना ज़रूरी है । खुदा ना ख्वास्ता मरने के बाद येही जानवर मुसल्लत कर दिया गया तो फिर क्या बनेगा ? 



कुरबानी के जानवर के बाल और ऊन वगैरा काटना कैसा ? / How to cut hair and wool etc. of Qurbani animal?

सुवाल : कुरबानी के बा'ज़ जानवरों के जिस्म पर बहुत बड़े बड़े बाल होते हैं , उन्हें ज़ब्ह करते वक्त अगर दुश्वारी हो रही हो तो क्या उन बालों को काट सकते हैं ? अगर किसी ने वोह बाल काट दिये तो उन बालों का क्या हुक्म है ? 

जवाब : कुरबानी के जानवर के बाल और ऊन वगैरा काटना मरूह है अगर किसी ने बाल या ऊन वगैरा काट दी तो इन चीज़ों को न तो वोह अपने इस्ति'माल में ला सकता है और न ही किसी गनी को दे सकता है बल्कि ।

उन बालों और ऊन वगैरा को किसी शई फ़क़ीर पर सदक़ा करना होगा । रही बात ज़ब्ह के वक्त दुश्वारी पेश आने की तो इस के लिये पूरे बदन के बाल काटना तो दूर की बात गले के बाल काटने की भी ज़रूरत नहीं बल्कि गले पर पानी वगैरा डाल कर जगह बनाई जा सकती है । 



बे वुजू या बे नमाज़ी का ज़बीहा 

सुवाल : क़स्साब उमूमन बे वुजू , बे नमाज़ी और दाढ़ी मुन्डे होते हैं तो क्या उन से जानवर जब्ह करवाना दुरुस्त है ? नीज़ जानवर को ज़ब्ह करने के चन्द मदनी फूल भी बयान फ़रमा दीजिये । 

जवाब : जानवर ज़ब्ह करने के लिये बा वुजू , नमाज़ी और दाढ़ी वाला होना शर्त नहीं लिहाज़ा अगर दाढ़ी मुन्डे , बे वुजू और बे नमाज़ी शख्स ने भी जानवर ज़ब्ह किया तब भी जानवर हलाल हो जाएगा । 

★ ज़ाबेह ( या'नी ज़ब्ह करने वाले ) का मर्द होना भी शर्त नहीं , औरत या समझदार बच्चा भी ज़ब्ह कर सकते हैं अलबत्ता जो भी ज़ब्ह करे उसे ज़ब्ह के वक्त अल्लाह का नाम लेना ज़रूरी है ।

★ अगर किसी ने जान बूझ कर अल्लाह का नाम छोड़ दिया मसलन दो आदमी मिल कर जब्ह कर रहे थे , एक ने येह सोच कर अल्लाह का नाम न लिया कि दूसरे ने कह दिया है मेरा कहना ज़रूरी नहीं तो जानवर मुर्दार हो जाएगा । 

* ज़ब्ह के वक्त " , " के अल्फ़ाज़ कहना बेहतर है , शर्त नहीं लिहाज़ा अगर किसी ने फ़कत लफ़्ज़ " अल्लाह " कह कर छुरी चला दी तब भी जानवर हलाल हो जाएगा । 

★ अगर भूलने के सबब अल्लाह का नाम न लिया तब भी जानवर हलाल हो जाएगा ।


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