Muharram Me Kya Jaiz Hai मोहर्रम महीने में क्या जायज है

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इस्लामी मोहर्रम या मुहर्रम महीने में क्या-क्या चीज जायज है तफ़्सीर मालूमात / Muharram Me Kya Jaiz Hai

Muharram Me Kya Jaiz Hai मोहर्रम महीने में क्या जायज है

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    मुहर्रम में क्या -जाइज है?  Muharram Me Kya Jaiz Hai?

    Muharram Me Kya Jaiz Hai - हम पहले ही लिख चुके हैं कि हज़रत इमाम हुसैन Hazrat Imam Hussin हों या दूसरी अज़ीम इस्लामी शख़्सियतें उन से असली सच्ची हकीकी मुहब्बत व अकीदत तो यह है कि उनके रास्ते पर चला जाए और उनका रास्ता “इस्लाम' है। 

    पाँचों वक्त की नमाज की पबन्दी की जाए, रमजान के रोजे रखे जाएं; माल की जकात  निकाली जाए, बस की बात हो तो जिन्दगी में Me एक मर्तबा हज  भी किया जाए, जूए, शराब, जिना, सूद, झूठ, ग़ीबत, फ़िल्मी  गण गानों, तमाशों और पिक्चरों वगैरह नाजाइज़ व हराम Na Jaiz v haram कामो  से बचा जाए, 

    किसी की हक तलफी न॑ की जाए और उसके उनके साथ साथ उनकी मोहब्बत व अकीदत मुन्दर्जा जैल काम किए जाएं तो कुछ हरज नहीं बल्कि बाइसे खैर व बरकत है



    इस्लामी मोहर्रम या मुहर्रम महीने में क्या-क्या चीज जायज है तफ़्सीर मालूमात / Muharram Me Kya Jaiz Hai

    नियाज़ व फातिहा / Niyaz va Fatiha

    हज़रत इमाम हुसैन Hazrat Imam Hussin रजि अल्लाह 'तआला अन्हु और जो लोग उनके साथ शहीद किए गये उनको सवाब पहुंचने के लिए सदका व खैरात किया जाए, 

    गरीबों मिस्कीनों को या दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों वगैरह को शर्बत या खीचड़े या मलीदे वगैरह कोई भी जाइज  Jaiz  खाने पीने की चीज़ खिलाई या पिलाई जाए और उसके साथ-साथ आयाते कुरआनिया की तिलावत कर दी जाए तो और भी बेहतर है इसको उर्फ में नियाज़े व॑ फातिहा कहते हैं 

    यह सब बिला शक जाइज Jaiz और सवाब का काम है और बुजुर्गों से इंज्हारे अकीदत व मुहब्बत का अच्छा तरीका है लेकिन इस बारे में चन्द बातों का ध्यान रखना जरूरी है। 

    ( 1 ).  नियाज फातिहा Niyaz va Fatiha किसी भी हलाल और जाइज Jaiz खाने पीने की चीज़ पर हो सकती है उसके लिए शरबत, खिचड़े और मलीदे को ज़रूरी ख्याल करना जिहालत है इसलिए उन चीजों पर फातिहा दिलाने में Me भी कोई हरज नहीं है

    अगर कोई इन मज़्कूरा चीजों पर फातिहा दिलाता है तो वह कुछ बुरा नहीं करता हाँ जो उन्हें जरूरी ख्याल करता है उनके अलावा किसी और खाने पीने की चीज पर मुहर्रम में फातिहा Muharram Me Fatiha सही नहीं मानता वह ज़रूर जाहिल है।

    ( 2 ).  नियाज व फाततिहा Niyaz va Fatiha में शेखी खोरी नहीं होना चाहिए औरन खाने पिने के चीजों में एक दूसरे से मुकाबला बल्कि जो कुछ भी हो और जितना भी हो सब सिर्फ अल्लाह वालों के जरिए अल्लाह नज़दीकी और उसका क़ुरब और रज़ा हासिल करने के लिए हो और अल्लाह के नेक बन्दों से मुहब्बत इसलिए की जाती है 

    की उन से मुहब्बत काने और उनके नाम पर खाना खिलने और उनकी रहो को अचे कामो का सवाब पहुंचने से अल्लाह राज़ी होता हैं Hai और अल्लाह को राज़ी करना ही हर मुस्लमान की ज़िन्दगी का असल मकसद हैं

    ( 3 ).  नियाज़ व फातिहा Niyaz va Fatiha बुजुर्गों की हो या बड़े बूढ़ों की उसके तौर तरीके जो मुसलमानों में Me  राइज हैं जाइज़ Jaiz और अच्छे काम है फुर्ज और वाजिब नहीं अगर कोई करता है तो अच्छा करता है 

    और नहीं करता है तब भी गुनहगार नहीं हाँ कभी भी और बिल्कुल न करना महरूमी है। नियाज़ व फातिहा Niyaz va Fatiha को न करने वाला गुनहगार नहीं है हाँ उस से रोकने और मना करने वाला जरूर गुम्राह व बद मज्हब है Hai और बुजुर्गों के नाम से जलने वाला है।

    ( 4 ).  नियाज़ फातिहा के लिए बाल बच्चों को तंग करने की या किसी को परेशान करने की या खुद परेशान होने की या उन कामों के लिए कर्जे लेने की कोई जरूरत नहीं है। 

    जैसा और जितना मौका हो उतना करे और कुछ भी न हो तो सिर्फ कुरआन या कलिमा तैय्यबा या दुरूद शरीफ वगैरह जिक्र खैर करके या नफ़्ल नमाज़ या रोजे रख कर सवाब पहुंचा दि जाए तो यह काफी है Hai और मुकम्मल नियाज़ और पूरी फातिया है जिसमें कोई कमी यानी शरअन खामी नहीं है। 

    खुदाए _तआला ने इस्लाम के ज़रिए बन्दों पर उनकी ताकत से ज़्यादा बोछ नहीं डालां। जकात हो या सदक-ए-फित्र और क़ुरबानी सिर्फ़ उन्हीं पर फर्ज व वाजिब हैं Hai जो साहिबे हैसियत मालदार हों । हज उसी पर फर्ज कियागया 

    जिसके बस की बात हो। अकीका व वलीमा उन्हीं के लिए सुन्नत हैं जिनका मौका हो जबकि यह काम फर्ज व वाजिब या सुन्नत हैं और नियाज़ व फातिहा Niyaz va Fatiha उर्स वगैरह तो सिर्फ बिदआते हसना यानि सिर्फ अच्छे और मुस्तहब हैं

    फर्ज व वाजिब नहीं हैं यानी शरअन लाजिम व जरूरी नहीं हैं । फिर नियाज व फातिहा Niyaz va Fatiha के लिए कर्जे लेने, परेशान होने और बाल बच्चों को तंग करने की क्या Kya जरूरत है बल्कि हलाल कमाई से अपने बच्चों की परवरिश करना बजाते खुद एक किस्म की बेहतरीन नियाज़ और उम्दा फाइदा है |

    खुलासा यह हैं कि उर्स, नियाज़ व फातिहा Niyaz va Fatiha वगैरह बुजुर्गों की यादगारें मनाने की जो लोग मुख़ांलिफत करते हैं वह गलती पर हैं गुम्राह हैं और जो लोग सिंफ इन कामों को ही इस्लाम समझे हुवे हैं और शरअन लाजिम व जरुरी ख्याल करते वह भी बड़ी भूल में Me हैं।

    ( 5 ).  नियाज फातिहा की हो या कोई और खाने पीने की चीज उसको लुटाना, भीड़ में Me फेकना कि उसकी बेअदबी हो पैरो के निचे आए या नाली वगैरह व गन्दी जगहों पर गिरे एक गलत तरीका हैं जिस से बचना ज़रूरी है 

    जैसा कि मुहर्रम में Muharram Me कुछ लोग पूड़ी, गुलगुले या बिस्कुट वगैर छ्तों से फेकते और लुटाते है यह नामुनासिब हरकतें हैं। : 

    जिकरे शहादत 

    हज़रत सैयदना इमाम हुसैन Hazrat Imam Hussin रजि अल्लाहु तआला अन्हु और दूसरे हजराते अहले बैत किराम का जिक्र नज़्म में या नस्र में करनाऔर सुनना यकीनन जाइज़ Jaiz है और बाइसे खैर व् बरकत नजुले रहमत है लेकिन इस सिलसिले में नीचे लिखी हुई बातो को ध्यान में रखना जरूरी है।

    ( 1 ).  जिक्रे शहादतैन में सही रिवायात और सच्चे वाकेआत _ किए जाएं आजकल कुछ पेशावर मुकर्रिरों और शाइरों ने अवाम को खुश करने और तदरीरों को जमाने के लिए अजीब अजीब किस्से और अनोखी निराली हिकायात और गढ़ी हुई कहानियाँ और करामात बयान करना शुरू कर दिया है 

    क्योंकि अवाम को ऐसी बातें सुनने में मजा आता है और आजकल के अक्सर मुकुर्रिों को अल्लाह व रसूल से ज़्यादा अवाम को खुश करने की फिक्र रहती है Hai और बज़ाहिर सच से झूठ में मजा ज़्यादा है और जल्से ज्यादा तर मजे दारियों के लिए ही होते हैं।

    ( 2 ).  आला हज़रत मौलाना शाह अहमद रजा खाँ रहमतुल्लाहि लआला अलैहि फरमाते हैं । शहादत नामे नज़्म या नस्र जो आज कल अवाम में राइज हैं अक्सर रिवायाते बातिला व बेसरोपा से ममलू और अकाजीबे मौजूआ पर मुश्तमिल हैं 

    ऐसे बयान का पढ़ना और सुनना वहं शहादत नामा हो ख़्वाह कुछ और मज्लिसे मीलाद व मुबारक में हो ख्वाह कहीं और मुतलकन हराम व नाजाइज NaJaiz है। (फतावा 'रज्वीया जिल्द २४ सफ: ५१४ मत्वूआ) ऐसी चीजों का पढ़ना सुनना सब गुनाह व हराम है।

    ( 3 ).  जिक्रे शहादत का मक़्सद उन वाकेआत को सुन की 'इबरत व नसीहत हासिल करना हो और साथ ही साथ सालेहीन के जिक्र की बरकत हासिल करना भी । रोने और रुलाने के लिए वाकेआते करबला बयान करना नाजाइज़ NaJaiz व गुन्हा हैं 

    इस्लाम में 3 दिन से ज़्यादा मैय्यत का सोग जाइज Jaiz , नहीं | आला हज़रत इमाम अहमद रजा खाँ बरैलवी फरमाते हैं: शरीअत में औरत को शौहर की मौत पर चार महीने दस सोग मनाने का हुक्म दिया है औरों की मौत के तीसरे दिन तक इजाजत दी है बाकी हराम है 

    और हर साल सोग की तज्दीद तो असलन किसी के लिए हलाल नहीं । (फतावा स्वीया जिल्द २४, सफः ४६५, मत्बूआ बरकाते रजा पारे बन्दर)

    और यह रोना और रुलाना सब राफजीयों के तौर तरीके हैं क्योंकि उनकी किस्मत में ही यह लिखा हुआ है। राफजी गम मनाते हैं Hai और खारजी खुशी मनाते हैं और सुन्नी वाकेआते कखला को सुन कर नसीहत व इबरत हासिल करते हैं 

    और दीन की खातिर कुरबानियाँ देने का सबक लेते हैं और उनकी जिक्र की बरकत और फैज पाते हैं | हाँ अगर उनकी मुसीबतों को याद करके गम हो जाए या आंसू निकल आए तो यह जुहबत की पहचान है । 

    मतलब यह है कि एक होता है गम मनाना और गम करना और एक होता है ग़म हो जाना। गम मनाना और करना नाजाइज़ NaJaiz है और अज॒ ख़ुद हो जाए तो जाइज़ Jaiz है


    हम ने देखा है Hai कि कौम व वतन के लिए जब लोग मारे जाते हैं तो उनके घर व मुल्क वाले उन पर फख्र, करते हैं अहले बैत की मुसीबतों को याद करके ग़म होनां अगरचे ईमान की पहचान है 

    लेकिन साथ ही साथ उम्मते मुसल्लेमा को फख्र हैं कि उनके नबी के नवासे ने राहे खुदा में Me इस्लाम के लिए अपना गला कटा दिया है। 

    इंशाअल्लाह आप को मुहर्रम में क्या जाइज़ हैं Muharram Me Kya Jaiz Hai पोस्ट समाज मे आ गई हैं इसे शेयर करे और ढेरो सारिया निकिया कमाए।  

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