इमाम हुसैन का घोडा Imam Hussain Ka Ghoda का सच In Hindi

Imam Hussain Ka Ghoda इमाम हुसैन के घोड़े Zuljanah के बारे में बोले गए मन घडत वाकिया और इमाम हुसैन Imam Hussain की सवारी ऊंटनी थी का पूरा सच

इमाम हुसैन का घोडा Imam Hussain Ka Ghoda का सच In Hindi

Imam_Hussain,Karbala,
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इमाम हुसैन के घोड़े पर कुछ मनगढ़ंत किस्से बनाकर पेश किया जाता है कि इमाम हुसैन का घोड़ा Imam Hussain Ka Ghoda था वह कर्बला तशरीफ लाए तो उनके पास एक घोड़ा था जिसका नाम जुलजनाह Zuljanah था और और कर्बला में उनके पास घोडा था इमाम हुसैन के शहीद Shahid होने के बाद घोडा रोने लगा अपने सर के बालो को खून से रंग दिया इत्त्यादि,  

जो कि सरासर गलत है या सही इसपर एक मालूमात हासिल करते हैं निचे और यह मुसन्नीफ मुल्ला हुसैन काश्फ़ी ने अपनी किताबो में लिखा हैं जो की शिया मौलवी हैं। 



इमाम हुसैन का घोडा Imam Hussain Ka Ghoda था या इमाम ऊँटनी के साथ कर्बला तशरीफ़ लाए 


( 1 ) एक बार फिर रौज़तूश शुहदा

रौज़तूश शुहदा का एक गैर मुअतबर किताब है जिस मैं झूटे किस्से कहानियों की भरमार है ।

इस का मुसन्नीफ मुल्ला हुसैन काश्फ़ी ऐसे वाकियात घड़ने में माहिर है जिनसे मातम को फरोग दिया जा सके । 

मौसूफ अगर चाहें तो इमाम जैनूल आबिदीन की मुलाकात हज़रते अब्दुल्लाह बिन मुबारक से करवा देते हैं , मैदान - ए - करबला मैं शादी करवा देते हैं , इमाम मुस्लिम के बच्चों पर ऐसा अफ्साना लिख देते हैं की इस की असल कहीं नहीं मिलती , इन्हीं वाकियात मैं से एक इमाम हुसैन के घोड़े Imam Hussain Ka Ghoda जुलजनाह का वाकिया है । 



( 2 ) वाक़िया 

मुल्ला हुसैन काश्फी लिखता है कि इमाम हुसैन की शहादत के बाद आप का इमाम हुसैन का घोडा जुलजनाह बेक़रार हो कर चारों तरफ भागने लगा फिर कुछ देर बाद वापस आ कर उस ने अपनी पेशानी के बाल खून से तर किये और अपनी आँखों से आँसू बहाता हुआ खेमे की तरफ लौट आया । 

जब अहले बैत ने देखा तो उन्होने फरियाद करते हुये घोड़े से फरमाया कि ए जुलजनाह Zuljanah तू ने इमाम के साथ ये क्या किया ? 

तू उन्हें साथ ले कर गया था वापस क्यूँ नहीं लाया ? आखिर तू किस दिल के साथ उन्हें दुश्मनों के बीच छोड़ आया है ? 

अहले बैत नोहा कर रहे थे और जुलजनाह Zuljanah गर्दन झुकाये रो रहा था और अपने चेहरे को इमाम जैनुल आबिदीन के पाऊँ पर मल रहा था फिर उस घोड़े ने ज़मीन पर सर मारा और किसी शख्स को उस का निशान ना मिल सका ।



( 3 ) ये फर्जी और मनघड़त है

ये फर्जी और मनघढ़त किस्सा मुल्ला हुसैन काश्फी ने शियों की किताब से नक़ल किया है । किसी मुअतबर किताब में इस का कोई तज्किरा नहीं है । 

ऐसे वाकियात घढ़ने का सिर्फ एक मक़सद है और वो है नोहा ख्वानी को फरोग देना । 

पहली बात तो ये है कि इमाम हुसैन ने करबला तक ऊँटनी पर सफर किया तो ये इमाम हुसैन का घोडा Imam Hussain Ka Ghoda कहाँ से आ गया ? 


( 4 ) मैदाने करबला मैं इमाम हुसैन का घोडा Imam Hussain Ka Ghoda

इमाम सुयूती और शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहदिस दहेलवी रहीमहुल्लाह लिखते हैं कि हज़रते अली रदिअल्लाहु त'आला अन्हु ने एक मक़ाम पर फरमाया कि ये वो जगह है जहाँ उन ( शहीदाने करबला ) के ऊँट बैठेंगे और उन के कुजावो की जगह ये है और इस जगह उन का खून गिराया जायेगा ।

हज़रते अली रदिअल्लाहु त'आला अन्हु ने एक जगह की निशानदेही करते हुये फरमाया कि यहाँ उन के ऊँट बैठेंगे जिस से साबित होता है कि करबला में इमाम हुसैन के पास घोड़े नहीं थे । 


कुछ शियों ने लिखा है कि जब इमाम हुसैन रवाना होने लगे तो आप के भाई मुहम्मद बिन हनफिया ने आप को रोकने के लिये आप की ऊँटनी की नकील पकड़ ली । ( यानी आप ऊँटनी पर सवार थे । ) 

तारीख ए तबरी में है कि रास्ते में इमाम हुसैन ने फ़र्ज़दक शायिर से बातें की और फिर अपनी सवारी ( ऊँटनी ) को हरकत दी । 


 कुछ किताबों में इमाम हुसैन का ये कौल मौजूद है कि आप ने फरमाया : ये करबला मसाइब की जगह है , ये हमारे ऊँटनियों के बिठाने की जगह है , ये हमारे कुजावे रखने की जगह है और ये हमारे मर्दो की शहादत गाह है । 


एक शिया लिखता है कि इमाम हुसैन ने खिताब फरमाया फिर अपनी ऊँटनी बिठायी । 

शियों की एक बड़ी किताब " बिहारुल अनवार " में भी ये मौजूद है ।

बिहारुल अनवार में ये भी है कि मुहम्मद बिन हनफिया ने इमाम हुसैन को रोकने के लिये ऊँटनी की नकील पकड़ ली । 

इन के इलावा और भी कुछ कुतुब में ऊँटनियों का ही ज़िक्र है ।


अल कामिल में है कि इमाम हुसैन अपनी ऊँटनी पर सवार हुये और बुलंद आवाज़ से आवाज़ दी जिसे सब लोगों ने सुना । 

एक शिया लिखता है कि मैने ये इमाम हुसैन का घोडा Imam Hussain Ka Ghoda जुलजनाह का नाम हदीस , अखबार और तारीख की किसी मुअतबर किताब में नहीं देखा । 

इन तमाम हवाला जात से साबित होता है कि इमाम हुसैन Hazrat Imam Hussain के पास घोड़े नहीं थे । लेकिन कुछ लोग ना जाने कहाँ से घोड़े ले आते हैं । 

वैसे जो लोग इमाम जैनुल आबिदीन की मुलाक़ात हज़रते अब्दुल्लाह बिन मुबारक से करवा सकते हैं , मैदान - ए- करबला में शादी करवा सकते हैं , उन के लिये ऊँटों को भगा कर घोड़े लाना कोई बड़ी बात नहीं है ।



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