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Surah Fatiha फातिहा और इसाले सवाब बरकत In Hindi

Surah Fatiha फातिहा और इसाले सवाब की बरकत In Hindi

Surah Fatiha फातिहा और इसाले सवाब बरकत In Hindi


Surah Fatiha फातिहा का तरीका और इसाले सवाब बरकत  और उसके अहमियत

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ ۝

1 Bismi l-lāhi r-raḥmāni r-raḥīm(i)


ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَۙ ۝‎

2 ’al ḥamdu lil-lāhi rab-bi l-‘ālamīn


ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِۙ ۝‎

3 ’ar raḥmāni r-raḥīm


مَٰلِكِ يَوْمِ ٱلدِّينِۗ ۝‎

4 Māliki yawmi d-dīn


إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُۗ ۝‎

5 ’iy-yāka na‘budu wa’iy-yāka nasta‘īn


ٱهْدِنَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلْمُسْتَقِيمَۙ ۝‎

6 ’ihdinā ṣ-ṣirāṭa l-mustaqīm


صِرَٰطَ ٱلَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْۙ࣢ غَيْرِ ٱلْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا ٱلضَّآلِّينَࣖ ۝‎

7 Ṣirāṭa l-lazīna ’an‘amta ‘alayhim, ghayri l-maghḍūbi ‘alayhim wala ḍ-ḍāl-līn


फातिया और इसाले सवाब की बरकते Surah Fatiha

मर्हम रिश्तेदार को ख़्वाब में देखने का तरीका 

हज़रते अल्लामा अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन अहमद मालिकी कुरतुबी नक्ल करते हैं : हज़रते सय्यिदुना हसन बसरी की ख़िदमते बा ब - र - कत में हाज़िर हो कर एक औरत ने अर्ज की : मेरी जवान बेटी फ़ौत हो गई है , कोई तरीका इर्शाद हो कि मैं उसे ख़्वाब में देख लूं । आप , ने उसे अमल बताया (Surah Fatiha)। 

उस ने अपनी मर्दूमा बेटी को ख़्वाब में तो देखा , मगर इस हाल में देखा कि उस के बदन पर तारकोल ( या'नी डामर ) का लिबास , गरदन में जन्जीर और पाउं में बेड़ियां हैं ! येह हैबत नाक मन्ज़र देख कर वोह औरत कांप उठी ! उस ने दूसरे दिन हज़रते सय्यिदुना हसन बसरी को ख़्वाब सुनाया , सुन कर आप , बहुत मगमूम हुए । कुछ अर्से बा'द हज़रते सय्यिदुना हसन बसरी  ने ख्वाब में एक लड़की को देखा , जो जन्नत में एक तख्त पर अपने सर पर ताज सजाए बैठी है । 

आप को देख कर वोह कहने फरमाने मुस्तफा : जिस ने मुझ पर रोजे जुमुआ दो सो बार दुरूदे पाक पढ़ा उस के दो सो साल के गुनाह मुआफ होंगे ।  लगी : " मैं उसी ख़ातून की बेटी हूं , जिस ने आप को मेरी हालत बताई थी । " आप , ने फ़रमाया : उस के बकौल तो तू अज़ाब में थी , आख़िर येह इन्किलाब किस तरह आया ?

 मर्हमा बोली : कब्रिस्तान के करीब से एक शख्स गुज़रा और उस ने मुस्तफ़ा जाने रहमत , शम्ए बज़्मे हिदायत , नोशए बज्मे जन्नत , मम्बए जूदो सख़ावत , सरापा फज्लो रहमत - पर दुरूद भेजा , उस के दुरूद शरीफ़ पढ़ने की ब - र - कत से अल्लाह ने हम 560 क़ब्र वालों से अज़ाब उठा लिया । ) अल्लाह की उन पर रहमत हो और उन के सदके हमारी बे हिसाब मरिफ़रत हो । 

इस हिकायत से मालूम हुवा कि पहले के मुसल्मानों का बुजुर्गाने दीन 5 की तरफ़ खूब रुजूअ था , उन की ब - र - कतों से लोगों के काम भी बन जाया करते थे , येह भी मालूम हुवा कि महूम अज़ीज़ों ख्वाब में देखने का मुता - लबा करने में सख़्त इम्तिहान भी है कि अगर मर्रम को अज़ाब में देख लिया तो परेशानी का सामना होगा । इस हिकायत से ईसाले सवाब की जबर दस्त ब - र - कत भी जानने को मिली और येह भी पता चला कि सिर्फ एक बार दुरूद शरीफ़ पढ़ कर भी ईसाले सवाब किया जा सकता है । 

अल्लाह की बे पायां रहमतों के भी क्या कहने ! कि अगर वोह एक दुरूद शरीफ़ ही को कबूल फरमा ले तो उस के ईसाले सवाब की ब - र - कत से सारे के सारे कब्रिस्तान वालों पर भी अगर अज़ाब हो तो उठा ले और उन सब को इन्आमो इक्राम से मालामाल फ़रमा दे । 

जिन के वालिदैन या उन में कोई एक फ़ौत हो गया हो तो उन को चाहिये कि उन की तरफ़ से गफ़्लत न करें , उन की कब्रों पर हाज़िरी भी देते रहें और ईसाले सवाब भी करते रहें । इस ज़िम्न में 5 फ़रामीने मुस्तफ़ा - मुला - हज़ा फ़रमाइये : 

( 1 ) मक्बूल हज का सवाब (Surah Fatiha)

जो ब निय्यते सवाब अपने वालिदैन दोनों या एक की कब्र की ज़ियारत करे , हज्जे मक़बूल के बराबर सवाब पाए और जो ब कसरत इन की क़ब्र की जियारत करता हो , फ़िरिश्ते उस की क़ब्र की ( या'नी जब येह फौत होगा ) जियारत को आएं  


( 2 ) दस हज का सवाब (Surah Fatiha)

जो अपनी मां या बाप की तरफ़ से हज करे उन ( या'नी मां या बाप ) की तरफ़ से हज अदा हो जाए . इसे ( या'नी हज करने वाले को ) मजीद दस हज का सवाब मिले । 

जब कभी नफ्ली हज की सआदत हासिल हो तो फ़ौत शुदा मां या बाप की निय्यत कर लीजिये ताकि उन को भी हज का सवाब मिले , आप का भी हज हो जाए बल्कि मजीद दस हज का सवाब हाथ आए । अगर मां बाप में से कोई इस हाल में फ़ौत हो गया कि उन पर हज फ़र्ज़ हो चुकने के बा वुजूद वोह न कर पाए थे तो अब औलाद को हज्जे बदल का शरफ़ हासिल करना चाहिये 

" हज्जे बदल " के तप्सीली अहकाम के लिये दा'वते इस्लामी के इशाअती इदारे मक - त - बतुल मदीना की मत्बूआ किताब " रफ़ीकुल ह - रमैन " का सफ़हा 208 ता 214 का मुता - लआ फ़रमाइये । 


( ३ )वालिदैन की तरफ़ से खैरात 

जब तुम में से कोई कुछ नफ़्ल खैरात करे तो चाहिये कि उसे अपने मां बाप की तरफ़ से करे कि इस का सवाब उन्हें मिलेगा और इस के ( या'नी खैरात करने वाले के ) सवाब में कोई कमी भी नहीं आएगी । 


( 4 )  रोज़ी में बे ब - र - कती की वह बन्दा जब मां बाप के लिये दुआ तर्क कर देता है उस का रिज्क कृत्अ हो जाता है । 


( 5 ) जुमुआ को ज़ियारते क़ब्र की फ़ज़ीलत 

जो शख्स जुमुआ के रोज़ अपने वालिदैन या इन में से किसी एक की क़ब्र की जियारत करे और उस के पास सूरए यासीन पढ़े बख्श दिया जाए । 


कफ़न फट गए ! 

अल्लाह की रहमत बहुत बड़ी है , जो मुसल्मान दुन्या से रुख्सत हो जाते हैं उन के लिये भी उस ने अपने फ़ज़्लो करम के दरवाजे खुले ही रखे हैं । अल्लाह की रहमते बे पायां से मु - तअल्लिक एक ईमान अफ़ोज़ हिकायत पढ़िये और झूमिये ! चुनान्चे अल्लाह के नबी हज़रते सय्यिदुना अरमिया कुछ ऐसी कब्रों के पास से गुज़रे जिन में अज़ाब हो रहा था । 

एक साल बाद जब फिर वहीं से गुज़र हुवा तो अज़ाब ख़त्म हो चुका था । आप ने बारगाहे खुदा वन्दी में अर्ज की : या अल्लाह ! क्या वज्ह है कि पहले इन को अज़ाब हो रहा था अब ख़त्म हो गया ? आवाज़ आई : “ ऐ अरमिया ! इन के कफ़न फट गए , बाल बिखर गए और कळ मिट गई तो मैं ने इन पर रहूम किया और ऐसे लोगों पर मैं रहूम किया ही करता हूं । 


" करम ” के तीन हुरूफ की निस्बत से ईसाले सवाब के 3 ईमान अफ्रोज़ फ़ज़ाइल (Surah Fatiha)

( 1 ) दुआओं की ब - र - कत मदीने के सुल्तान - का फ़रमाने मरिफ़रत निशान है : मेरी उम्मत गुनाह समेत क़ब्र में दाखिल होगी और जब निकलेगी तो बे गुनाह होगी क्यूं कि वोह मुअमिनीन की दुआओं से बख़्श दी जाती है । 


( 2 ) ईसाले सवाब का इन्तिज़ार ! सरकारे नामदार - का मुर्दे का हाल कब में डूबते हुए इन्सान की मानिन्द है कि वोह शिद्दत से इन्तिज़ार करता है कि बाप या मां या भाई या किसी दोस्त की दुआ इस को पहुंचे और जब किसी की दुआ उसे पहुंचती है तो उस के नज़दीक वोह दुन्या व मा फ़ीहा ( या'नी दुन्या और इस में जो कुछ है ) से बेहतर होती है । अल्लाह कब वालों को उन के जिन्दा मु - तअल्लिक़ीन की तरफ़ से हदिय्या किया हुवा सवाब पहाड़ों की मानिन्द अता फरमाता है , ज़िन्दों का हदिय्या ( या'नी तोहफ़ा ) मुर्दो के लिये दुआए मरिफरत करना है । 


रूहें घरों पर आ कर ईसाले सवाब का मुता - लबा करती हैं । 

 मा'लूम हुवा मरने वाले अपनी कब्रों पर आने जाने वालों को पहचानते हैं और उन्हें ज़िन्दों की दुआओं से फाएदा पहुंचता है , जब ज़िन्दा लोगों की तरफ़ से ईसाले सवाब के तोहफे आना बन्द होते हैं , तो उन को आगाही हासिल हो जाती है और अल्लाह , उन्हें इजाज़त देता है तो घरों पर जा कर ईसाले सवाब का मुता - लबा भी करते हैं । 

मेरे आका आ'ला हज़रत इमामे अहले सुन्नत मुजद्दिदे दीनो मिल्लत मौलाना शाह इमाम अहमद रज़ा खान फतावा र - ज़विय्या ( मुखर्रजा ) जिल्द 9 सफ़हा 650 पर नक्ल करते हैं : " गराइब " और " खज़ाना " में मन्कूल है कि मुअमिनीन की रूहें हर शबे जुमुआ ( या'नी जुमा'रात और जुमुआ की दरमियानी रात ) रोजे ईद , रोज़े आशूरा और शबे बराअत को अपने घर आ कर बाहर खड़ी रहती हैं और हर रूह गमनाक बुलन्द आवाज़ से निदा करती ( या'नी पुकार कर कहती ) surah fatiha english transliteration


( 3 ) दूसरों के लिये दुआए मरिफरत करने की फ़ज़ीलत (Surah Fatiha)

फ़रमाने मुस्तफा जो कोई तमाम मोमिन मी और औरतों के लिये दुआए मरिफ़रत करता है , अल्लाह - उस के लिये हर मोमिन मर्द व औरत के इवज़ एक नेकी लिख देता है । अरबों नेकियां कमाने का आसान नुस्ख़ा मिल गया ! 

झूम जाइये ! अरबों , खरबों नेकियां कमाने का आसान नुस्खा हाथ आ गया ! ज़ाहिर है इस वक़्त रूए ज़मीन पर करोड़ों मुसल्मान मौजूद हैं और करोड़ों बल्कि अरबों दुन्या से चल बसे हैं । अगर हम सारी उम्मत की मम्फिरत के लिये दुआ करेंगे तो  हमें अरबों , खरबों नेकियों का खजाना मिल जाएगा । 

मैं अपने लिये और तमाम मुअमिनीन व मुअमिनात के लिये दुआ तहरीर कर देता हूं । ( अव्वल आखिर दुरूद शरीफ़ पढ़ लीजिये ) ढेरों नेकियां हाथ आएंगी । या'नी ऐ अल्लाह ! मेरी और हर मोमिन व मोमिना की मरिफरत फ़रमा । आप भी ऊपर दी हुई दुआ को अ - रबी या उर्दू या दोनों ज़बानों में अभी और हो सके तो रोज़ाना पांचों नमाजों के बाद भी पढ़ने की आदत बना लीजिये ।


  • नूरानी लिबास surah fatiha english transliteration

एक बुजुर्ग ने अपने मर्दुम भाई को ख़्वाब में देख कर पूछा : क्या जिन्दा लोगों की दुआ तुम लोगों को पहुंचती है ? महूम ने जवाब दिया : " हां अल्लाह की क़सम ! वोह नूरानी लिबास की सूरत में आती है उसे हम पहन लेते हैं । "  


  • नूरानी तबाक़ 

मन्कूल है : जब कोई शख्स मय्यित को ईसाले सवाब करता है तो हज़रते जिब्रईल उसे नूरानी तबाक़ में रख कर कब्र के कनारे खड़े हो जाते हैं और कहते हैं : " ऐ कब्र वाले ! येह हदिय्या या'नी तोहफा ) तेरे घर वालों ने भेजा है कबूल कर । " येह सुन कर वोह खुश होता है और उस के पड़ोसी अपनी महरूमी पर गमगीन होते हैं । 


  • मुर्दो की तादाद के बराबर अज्र 

फ़रमाने मुस्तफा जो कब्रिस्तान में ग्यारह बार सू - रतुल इख्लास पढ़ कर मुर्दो को इस का ईसाले सवाब करे तो मुर्दो की तादाद के बराबर ईसाले सवाब करने वाले को इस का अज्र मिलेगा ।  


  • सब क़ब्र वालों को सिफारिशी बनाने का अमल 

सुल्ताने दो जहान , शफ़ीए मुजरिमान - का फ़रमाने शफाअत निशान है : “ जो शख्स कब्रिस्तान में दाखिल हुवा फिर उस ने सू - रतुल फ़ातिहा , सू - रतुल इख्लास और सू - रतुत्तकासुर पढ़ी फिर येह दुआ मांगी : या अल्लाह ! मैं ने जो कुछ कुरआन पढ़ा उस का सवाब इस कब्रिस्तान के मोमिन मर्दो और मोमिन औरतों को पहुंचा । तो वोह सब के सब कियामत के रोज़ इस ( या'नी ईसाले सवाब करने वाले ) (Surah Fatiha) के सिफ़ारिशी होंगे । " 


  • सूरए इख्लास के ईसाले सवाब (Surah Fatiha) की हिकायत 

हज़रते सय्यिदुना हम्माद मक्की फ़रमाते हैं : मैं एक रात मक्कए मुकर्रमा के कब्रिस्तान में सो गया । क्या देखता हूं कि क़ब्र वाले हल्का दर हल्का खड़े हैं , मैं ने उन से इस्तिफ्सार किया ( या'नी पूछा ) : क्या कियामत काइम हो गई ? उन्हों ने कहा : नहीं , बात दर अस्ल येह है कि एक मुसल्मान भाई ने सू - रतुल इख्लास पढ़ कर हम को ईसाले सवाब किया तो वोह सवाब हम एक साल से तक्सीम कर रहे हैं । 


  • उम्मे सा'द के लिये कुंआं 

हज़रते सय्यदुना सा'द बिन उबादा  - ने अर्ज की : या रसूलल्लाह-  ! मेरी मां इन्तिकाल कर गई हैं ( मैं उन की तरफ से स - दका ( या'नी खैरात ) करना चाहता हूं ) कौन सा स - दका अफ्ज़ल रहेगा ? सरकार - ने फ़रमाया : " पानी । " चुनान्चे उन्हों ने एक कुंआं खुदवाया और कहा : या'नी " येह उम्मे साद के लिये है । "



  • गौस पाक का बकरा कहना कैसा ? 

सय्यिदुना सा'द ज के इस इर्शाद : " येह उम्मे सा'द  के लिये है " के मा'ना येह हैं कि येह कूआं सा'द - की मां के ईसाले सवाब के लिये है । इस से येह भी मालूम हुवा कि मुसल्मानों का गाय या बकरे वगैरा को बुजुर्गों की तरफ़ मन्सूब करना म - सलन येह कहना कि " येह सय्यिदुना गौसे पाक , का बकरा है " इस में कोई हरज नहीं कि इस से मुराद भी येही है कि येह बकरा गौसे पाक के ईसाले सवाब के लिये है । 

कुरबानी के जानवर को भी तो लोग एक दूसरे ही की तरफ़ मन्सूब करते हैं , म - सलन कोई अपनी कुरबानी का बकरा लिये चला आ रहा हो और अगर आप उस से पूछे कि किस का बकरा है ? तो उस ने कुछ इस तरह जवाब देना है , " मेरा बकरा है " या " मेरे मामूं का बकरा है । " जब येह कहने वाले पर ए'तिराज़ नहीं तो " गौसे पाक का बकरा " कहने वाले पर भी कोई ए'तिराज नहीं हो सकता । हक़ीक़त में हर शै का मालिक अल्लाह ही है और कुरबानी का बकरा हो या गौसे पाक का बकरा , ज़बह के वक्त हर ज़बीहा पर अल्लाह का ही नाम लिया जाता है । अल्लाह - वस्वसों से नजात बलो । 


" अल्लाह की रहमत के क्या कहने ! " के उन्नीस हुरूफ़ की निस्बत से ईसाले सवाब (Surah Fatiha)  

( 1 ) ईसाले सवाब के लफ्ज़ी मा'ना हैं : “ सवाब पहुंचाना " इस को " सवाब बख़्शना " भी कहते हैं मगर बुजुर्गों के लिये “ सवाब बख़्शना " कहना मुनासिब नहीं , " सवाब नज़ करना " कहना अदब के ज़ियादा क़रीब है । इमाम अहमद रज़ा खान फ़रमाते हैं : हुजूरे  अवदस ख्वाह और नबी या वली को " सवाब बख्शना " कहना बे अ - दबी है बख़्शना बड़े की तरफ से छोटे को होता है बल्कि नज करना या हदिय्या करना कहे । ( फ़तावा र - ज़विय्या , जि . 26 , स . 609 ) 

( 2 ) फ़र्ज़ , वाजिब , सुन्नत , नफ़्ल , नमाज़ , रोज़ा , जकात , हज , तिलावत , ना'त शरीफ़ , जिकुल्लाह , दुरूद शरीफ़ , बयान , दर्स , म - दनी काफिले में सफ़र , म - दनी इन्आमात , अलाकाई दौरा बराए नेकी की दावत , दीनी किताब का मुता - लआ , म - दनी कामों के लिये इन्फिरादी कोशिश वगैरा हर नेक काम का ईसाले सवाब कर सकते हैं । 


( 3 ) मय्यित का तीजा , दसवां , चालीसवां और बरसी करना बहुत अच्छे काम हैं कि येह ईसाले सवाब के ही ज़राएअ हैं । शरीअत में तीजे वगैरा के अ - दमे जवाज़ ( या'नी ना जाइज़ होने ) की दलील न होना खुद दलीले जवाज़ है और मय्यित के लिये ज़िन्दों का दुआ करना कुरआने करीम से साबित है जो कि " ईसाले सवाब " की अस्ल है । चुनान्चे पारह 28 सू - रतुल हश्र आयत 10 में इर्शादे रब्बुल इबाद है : 

तर - ज - मए कन्जुल ईमान : और वोह जो उन के बाद आए अर्ज करते हैं : ऐ  हमारे रब  ! हमें बख़्श दे और  हमारे भाइयों को जो हम से पहले ईमान लाए । surah fatiha benefits


( 4 ) तीजे वगैरा का खाना सिर्फ इसी सूरत में मय्यित के छोड़े हुए माल से कर सकते हैं जब कि सारे वु - रसा बालिग हों और सब के सब इजाजत फरमाने मुस्तफा उस शरमा को नाकवाक आलूद हो जिस के पास मेरा गिक हो और बोह मुझ पर दुरुदे पाकन पो । ( ५ ) भी दें अगर एक भी वारिस ना बालिग है तो सख्त हराम है । हां बालिग अपने हिस्से से कर सकता है । 

( मुलख्वस अज़ बहारे शरीअत , जि .1 , हिस्सा : 4 , स . 822 )surah fatiha benefits 


( ५ ) तीजे का खाना चूंकि उमूमन दा'वत की सूरत में होता है इस लिये अग्निया के लिये जाइज़ नहीं सिर्फ गु - रबा व मसाकीन खाएं , तीन दिन के बाद भी मय्यित के खाने से अग्निया ( या'नी जो फ़कीर न हों उन ) को बचना चाहिये । फ़तावा र - ज़विय्या जिल्द 9 सफ़हा 667 से मय्यित के खाने से मु - तअल्लिक एक मुफीद सुवाल जवाब मुला - हज़ा हों ,  surah fatiha mp3

सुवाल : मकूला ( मय्यित का खाना दिल को मुर्दा कर देता है । ) मुस्तनद कौल है , अगर मुस्तनद है तो इस के क्या मा'ना हैं ? surah fatiha mp3

जवाब : येह तजरिबे की बात है और इस के मा'ना येह हैं कि जो तआमे मय्यित के मु - तमन्नी रहते हैं उन का दिल मर जाता है , ज़िक्र व ताअते इलाही के लिये हयात व चुस्ती उस में नहीं कि वोह अपने पेट के लुक्मे के लिये मौते मुस्लिमीन के मुन्तज़िर रहते हैं और खाना खाते वक्त मौत से गाफ़िल और उस की लज्जत में शागिल । 

( फ़तावा र - ज़विय्या मुखर्रजा , जि . 9 , स . 667 ) surah fatiha urdu translation


( 6 ) मय्यित के घर वाले अगर तीजे का खाना पकाएं तो ( मालदार न खाएं ) सिर्फ फु - करा को खिलाएं जैसा कि मक - त - बतुल मदीना की मत्बूआ बहारे शरीअत जिल्द अव्वल सफ़हा 853 पर है : मय्यित के घर वाले तीजे वगैरा के दिन दा'वत करें तो ना जाइज़ व बिअते कबीहा है कि दा'वत तो खुशी के वक्त मश्रूअ ( या'नी शर - अ के मुवाफ़िक़ ) है न कि गम के वक़्त और अगर फु - करा को खिलाएं तो बेहतर है । ( ऐजन , स . 853 ) 


( 7 ) आ'ला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फ़रमाते हैं : " यूही चेहलुम या बरसी या शश्माही पर खाना बे निय्यते ईसाले सवाब महज़ एक रस्मी तौर पर पकाते और " शादियों की भाजी " की तरह बरादरी में बांटते हैं , वोह भी बे अस्ल है , जिस से एहतिराज़ ( या'नी एहतियात करनी ) चाहिये । " 

( फ़्तावा र - ज़विय्या मुखरजा , जि . 9 , स . 671 ) surah fatiha urdu translation

बल्कि येह खाना ईसाले सवाब और दीगर अच्छी अच्छी निय्यतों के साथ होना चाहिये और अगर कोई ईसाले सवाब के लिये खाने का एहतिमाम न भी करे तब भी कोई हरज नहीं । 


( 8 ) एक दिन के बच्चे को भी ईसाले सवाब कर सकते हैं , उस का तीजा वगैरा भी करने में हरज नहीं । और जो जिन्दा हैं उन को भी ईसाले सवाब किया जा सकता है । surah fatiha bangla


( 9 ) अम्बिया व मुर - सलीन और फ़िरिश्तों और मुसल्मान जिन्नात को भी ईसाले सवाब (Surah Fatiha) कर सकते हैं ।  surah fatiha bangla


( 10 ) ग्यारहवीं शरीफ़ और र - जबी शरीफ़ ( या'नी 22 र - जबुल मुरज्जब को सय्यिदुना इमाम जा'फरे सादिक के कूडे करना ) वगैरा जाइज़ है । कूडे ही में खीर खिलाना ज़रूरी नहीं दूसरे बरतन में भी खिला सकते हैं , इस को घर से बाहर भी ले जा सकते हैं , इस मौकअ पर जो " कहानी " पढ़ी जाती है वोह बे अस्ल है , यासीन शरीफ़ पढ़ कर 10 कुरआने करीम ख़त्म करने का सवाब कमाइये और कुंडों के साथ साथ इस का भी ईसाले सवाब कर दीजिये । 

surah fatiha in english text

( 11 ) दास्ताने अजीब , शहज़ादे का सर , दस बीबियों की कहानी और जनाबे सय्यिदह की कहानी वगैरा सब मन घड़त किस्से हैं , इन्हें हरगिज़ न पढ़ा करें । इसी तरह एक पेम्फलेट बनाम " वसिय्यत नामा " लोग तक्सीम करते हैं जिस में किसी “ शैख़ अहमद " का ख्वाब दर्ज है येह भी जा'ली ( या'नी नक्ली ) है इस के नीचे मख्सूस ता'दाद में छपवा कर बांटने की फजीलत और न तक्सीम करने के नुक्सानात वगैरा लिखे हैं उन का भी ए'तिबार मत कीजिये । surah fatiha in english text



( 12 ) औलियाए किराम की फ़ातिहा के खाने को ता जीमन " नो नियाज " कहते हैं और येह तब क है , इसे अमीर व गरीब सब खा सकते हैं । surah fatiha audio


( 13 ) नियाज़ और ईसाले सवाब के खाने पर फ़ातिहा पढ़ाने के लिये किसी को बुलवाना या बाहर के मेहमान को खिलाना शर्त नहीं , घर के अपराद अगर खुद ही फ़ातिहा पढ़ कर खा लें जब कोई हरज नहीं । 


( 14 ) रोज़ाना जितनी बार भी खाना हस्बे हाल अच्छी अच्छी निय्यतों के साथ खाएं , उस में अगर किसी न किसी बुजुर्ग के ईसाले सवाब की निय्यत कर लें तो खूब है । म - सलन नाश्ते में निय्यत कीजिये : आज के नाश्ते का सवाब सरकारे मदीना और आप के जरीए तमाम अम्बियाए किराम को पहुंचे । दो पहर को निय्यत कीजिये : अभी जो खाना खाएंगे ( या खाया ) उस सवाब सरकारे गौसे आज़म और तमाम औलियाए किराम को पहुंचे , रात को निय्यत कीजिये : (surah fatiha in hindi)

अभी जो खाएंगे उस का सवाब इमामे अहले सुन्नत इमाम अहमद रज़ा ख़ान और हर मुसल्मान मर्द व औरत को पहुंचे या हर बार सभी को ईसाले सवाब किया जाए और येही अन्सब ( या'नी ज़ियादा मुनासिव ) है । याद रहे ! ईसाले सवाब सिर्फ उसी सूरत में हो सकेगा जब कि वोह खाना किसी अच्छी निय्यत से खाया जाए म - सलन इबादत पर कुव्वत हासिल करने की निय्यत से खाया तो येह खाना खाना कारे सवाब हुवा और उस का ईसाले सवाब हो सकता है । अगर एक भी अच्छी निय्यत न हो तो खाना खाना मुबाह कि इस पर न सवाब न गुनाह , तो जब सवाब ही न मिला तो ईसाले सवाब कैसा ! अलबत्ता दूसरों को ब निय्यते सवाब खिलाया हो तो उस खिलाने का सवाब ईसाल हो सकता है ।surah fatiha audio ई 


( 15 ) अच्छी अच्छी निय्यतों के साथ खाए जाने वाले खाने से पहले ईसाले सवाब करें या खाने के बाद , दोनों तरह दुरुस्त है । 


( 16 ) हो सके तो हर रोज़ ( नफ्अ पर नहीं बल्कि ) अपनी बिक्री  का चौथाई फीसद ( या'नी चार सो रुपै पर एक रुपिया ) और मुला - जमत करने वाले तन - ख्वाह का माहाना कम अज़ कम एक फ़ीसद सरकारे गौसे आजम की नियाज़ के लिये निकाल लिया करें , ईसाले सवाब की निय्यत से इस रकम से दीनी किताबें तक्सीम करें या किसी भी नेक काम में खर्च करें इस की ब - र - कतें खुद ही देख लेंगे । 


( 17 ) मस्जिद या मद्रसे का कियाम स - द - कए जारिय्या और ईसाले सवाब का बेहतरीन जरीआ है । 


( 18 ) जितनों को भी ईसाले सवाब करें अल्लाह की रहमत से उम्मीद है कि सब को पूरा मिलेगा , येह नहीं कि सवाब तकसीम हो कर टुकड़े टुकड़े मिले । ईसाले सवाब करने वाले के सवाब में कोई कमी वाकेअ नहीं होती बल्कि येह उम्मीद है कि उस ने जितनों को ईसाले सवाब किया उन सब के मज्मूए के बराबर इस ( ईसाले सवाब करने वाले ) को सवाब मिले । म - सलन कोई नेक काम किया जिस पर इस को दस नेकियां मिलीं अब इस ने दस मुर्दो को ईसाले सवाब किया तो हर एक को दस दस नेकियां पहुंचेंगी जब कि ईसाले सवाब करने वाले को एक सो दस और अगर एक हज़ार को ईसाले सवाब किया तो इस को दस हज़ार दस । ( और इसी कियास पर ) 

( बहारे शरीअत , जि . 1 , हिस्सा : 4 , स . 850 ) (surah fatiha in hindi)


( 19 ) ईसाले सवाब (Surah Fatiha) सिर्फ मुसल्मान को कर सकते हैं । काफ़िर या मुरतद को ईसाले सवाब करना या उस को " महूम " , जन्नती , खुल्द आशियां , बेंकठ बासी , स्वर्ग बासी कहना कुफ़ है ।

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