Hazrat Baba Tajuddin Aulia बचपन कामठी बस्तर सागर चमत्कार

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Hazrat Baba Tajuddin Aulia बचपन कामठी बस्तर सागर चमत्कार

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हजरत बाबा सैयद मुहम्मद ताजुद्दीन Hazrat Baba Tajuddin Aulia ( रहमतुल्लाह अलैह ) का जन्म ५ रज्जब - उल - मुरज्जब ( इस्लामी साल का सातवाँ महीना ) १२८३ हिजरी मुताबिक २७ जनवरी १८६२ ( कुछ किताबों में २७ जनवरी १८६१ मुताबिक १५ रज्जब - उल - मुरज्जब १२८२ हिजरी भी मिलता है ) को मुकाम गोरा बाजार कामठी Kamptee में हुआ । 

विभिन्न बयानात की बुनियाद पर बाबा हुजूर की जन्म तिथि सही समझ नहीं आती । जन्म के समय आप आम बच्चों की तरह रोए नहीं । 

बाबा हुजूर की नानी साहेबा मोहतरमा साजेदा बेगम के कहने पर तांबे के सिक्के को गर्म करके आप के माथे को दागा गया तब आपने फौरन आँखें खोल दी । 

यह दाग आपके पवित्र माथे पर जीवन भर रहा । ऐसी ही घटना आप की अम्मीजान की पैदाईश के वक्त भी पेश आयी थी ।


आप बाबा हुजूर के परिवार के लोग मद्रास से सफर करके अग्रेजों के कार्यकाल में कामठी आए । पारिवारिक पेशा सिपाहगिरी धा जबकि आपके दादाजान हजरत सैयद अब्दुल्लाह ( रहमतुल्लाह अलेह ) अरब से तिजारत करने हिन्दुस्तान तशरीफ लाए । 

यूँ तो बाबा हुजूर के पवित्र परिवार में उच्च श्रेणी के फौजी अफसरों की कड़ी मिलती है जो बड़े - बड़े पदों पर कार्यरत थे । 

बाबा हुजूर Baba Tajudin के खानदानी सिलसिले में दक्षिण भारत में पूर्वजों के मजार मिलते हैं । पारिवारिक बुजुर्ग हजरत सैयद फखरुद्दीन ( रहमतुल्लाह अलैह ) जो पेनकुंडा के रहने वाले थे , का मजार शहर कोलार में है । 

वहाँ मौजूद बाबा हुजूर के ददयाली रिश्तेदार आज भी दरबारे ताजुल औलिया से संबंध रखते हैं । शहर कोलार से बाबा हुजूर का खास ताल्लुक है । 

यूँ तो हिन्दुस्तान में बाबा हुजूर के नातेदारों की एक बड़ी कड़ी मिलती है . मगर जो दर्जा व स्थान बाबा हुजूर को मिला वह किसी और के हिस्से में नहीं आया । 


कामठी आने के बाद बाबाजान के अब्बूजान हजरत सैयद बदरुद्दीन ( रहमतुल्लाह अलैह ) जो कि अंग्रेजों के कार्यकाल में बटालियन नबर २२ में सूबेदार के पद पर तैनात थे और बाबा हुजूर के नाना जान हजरत शेख मीरां साहब बटालियन नंबर ३२ में सूबेदार के पद पर कार्यरत थे । 

लिहाजा मुनासिब समझ कर दादाजान ने आप के अब्बूजान का रिश्ता इस खानदान में तय कर दिया । 

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बाबा हुजूर की पैदाईश के एक साल बाद ही अब्बूजान सेयद बदरुद्दीन साहब का इतेकाल हो गया । बाबा हुजूर के अब्बूजान कामठी Kamptee कटोनमेंट ( फौजी छावनी ) सन १८५४ ईसवी में आए थे । 

आप की फौजी कमान में सभी धर्म के लोग शामिल थे । फौजी कमान में जिन खास लोगों के नाम मिलते हैं वह यह है 

जनाब अब्दुर्रहीम कारफिल , गौस हवालदार , मुहम्मद गालिब सूबेदार , उस्ताद सुल्तान मदीन खानसामा , मुस्तुफा खान रंजीमेन्ट नायक , हवलदार रहीम खान उस्तादगर , नरसैया नायक , बाचिया एकार , बदलू जरगर उस्तादगर , रामायन स्वामी हवलदार, इत्यादी 


बाबा हुजूर Baba Tajuddin के अब्बूजान के दुनिया से जाने के बाद बाबा हुजूर के पालन पोषण का जिम्मा आप की अम्मीजान मरयम बी साहेबा और रिश्तेदारों ने उठाया ।

बाबा हुजूर की अम्मीजान ने बेहद लगन से अपने दुलारे की देखभाल की । जब उम्र ६ बरस हुई तो आप को मदरसे में दाखिल करवा दिया गया । बाबाजान ने खास तौर से अरबी , फारसी , उर्दू और अंग्रेजी में महारत हासिल की । 

कहा जाता है कि जब मदरसे में मौलवी साहब ने आप को पवित्र कुरआन से बिस्मिल्लाह पढ़ाई तो आप आगे सुरह फातेहा तक पढ़ गए । यह भी कहा जाता है कि उसी समय हजरत शाह अब्दुल्लाह कादरी नौशाही जो कामठी के मशहूर बुजुर्ग हैं , 

मदरसे में तशरीफ लाए और शिक्षक से फरमाया , जिस बच्चे को तुम सिखा रहे हो , वह पहले ही से सीख कर आया है । इस लिए तुम अपना और उस का समय नष्ट मत करो । 

जब बाबा हुजूर की उम्र ९ बरस हुई तो अम्मीजान भी दुनिया से रुखसत हो गई । इस प्रकार आप की परवरिश का जिम्मा ननिहाली रिश्तेदारों ने उठाया ।


अम्मीजान के इंतेकाल के बाद बाबा हुजूर नानी साहेबा , मामूजान और रिश्ते की बहनें लालबी साहेबा , बीना बेगम साहेबा , आमेना बेगम साहेबा और अमीरबी साहेबा के बहुत लाडले थे । यू तो सभी बहनें बाबा हुजूर को बहुत प्यार से रखती थीं 

मगर अमीरबी साहेबा आप को दुनियादारी और दीनदारी बहुत प्यार मोहब्बत से सिखलाती । कभी - कभी बाबा हुजूर बड़े फन से कह उठते क्यूँ बहन " मैं चराग - ए - दीन ह ना जी ! " आप की बहन फरमाती , " अल्लाह आप को चराग - ए - दीन कर दे । " ( चंद अजान चराग ए - दीन को चिरागउद्दीन कहते हैं ) । 

बचपन ही से बाबा हुजूर Baba Tajudin की नेक आदतें जाहिर थीं । इबादत व रियाजत आप का शौक था । तकरीबन १३ साल की उम्र में आप कहीं निकल पड़े जिसकी खबर किसी को न हुई ।


मुहर्रम की १६ तारीख से बाबा हुजूर बुखार में मुबतेला हुए । माहिर हकीम आप की खिदमत में हाजिर थे । डॉ . चूलकर जो बाबा हुजूर के बहुत अकीदतमंद थे , उन का कहना था कि बीमारी कुछ नजर नहीं आती इलाज क्या किया जाए । 

२६ मोहर्रम को जबकि आप के अकीदतमंदों का हुजूम था , आपकी हालत भी बदली हुई थी । आप अचानक पलंग से उठे । सब पर निगाहें करीमी डाली । 

हाथ उठाए सब के लिए दुआ की और फिर पलंग पर लेट गए । हल्की सी आवाज़ के साथ रुह ने जिस्म से रिश्ता तोड़ लिया । 

बरोज़ पीर २६ मोहर्रमुल हराम १३४४ हिजरी मुताबिक १७ अगस्त १ ९ २५ को आप इस जहान से परदा कर गए ।




बस्तर के जंगलो में बाबा ताजुद्दीन Hazrat Baba Tajuddin Aulia


हजरत बाबा ताजुद्दीन ( रहमतुल्लाह अलैह ) छह बरस की उम्र से मदरसा जाने लगे । मदरसे में पढ़ाई पूरी करने के बाद आप तकरीबन १३ बरस की उम्र में बस्तर ( छत्तीसगढ़ ) Bastar Chhattisgarh के जंगलों की ओर चल पड़े । 

इस रवानगी का किसी को भी पता न चला । आपकी तलाश में लोग यहाँ - वहाँ भटकते रहे । आप के नानाजान हजरत शेख मीरों को आप से बेइंतेहा मोहब्बत थी । 
आपकी जुदाई उन्हें बरदाश्त न हो सकी । कुछ अरसे बाद नानाजान दुनिया से कूच कर गए । यस्तर के जंगलों में बाबा हुजूर Baba Tajuddin ने रियाजत जारी रखी । 

पेड़ पर चढ़कर आप सलातुल माकूस ( एक किस्म की रियाजत ) अदा करते रहे । बस्तर Bastar Chhattisgarh के जंगलों में जादूगरों का बसेरा था । जादूगरी उनका पेशा था । 
जब उनका जादू मंद पड़ने लगा तो वह लोग बहुत परेशान हुए और इसकी वजह तलाश करने लगे । जादूगरों का एक सरदार हुआ करता था । वह समझ गया कि इसकी वजह क्या है । 

जहाँ बाबा हुजूर इबादत कर रहे थे वे लोग वहाँ पहुंचे और अपने जादू से बाबा हुजूर पर वार करने लगे । वे नहीं समझ सके कि वे कितनी बड़ी गलती कर रहे हैं । 
जब उन पर उल्टा असर होने लगा तो कोई अपाहिज हो गया तो किसी की आंख जाती रही । जब उनके जादू का बाबा हुजूर Baba Tajudin पर जोर न चला तब वे लोग समझ गए कि अब उन का जादू चलने वाला नहीं । 

जादूगरों के गुरु ने सोचा कि अब माफी मांगे बगैर काम नहीं चल सकता तो वह अपने कबीले समेत बाबा हुजूर से माफी मांगने की गरज से वहाँ पहुंचा । 
सने पाया कि बाबा हुजूर अपनी रियाज़त में उसी हालत में हैं तो उस ने दो लोगों को वहाँ तैनात कर दिया कि हजरत जब भी पेड़ से नीचे उतरें तो उन्हें खबर की जाए कि वह लोग उनसे माफी मांगना चाहते हैं । 

फिर ऐसा ही हुआ कि कुछ ही अरसे में हजरत पेड़ से नीचे उतर आए । कबीले के सरदार को खबर की गई वह अपने साथियों के साथ वहाँ हाजिर हुआ और गिड़गिड़ा कर माफी मांगी बाबा हुजूर ने उन्हें माफ कर दिया । 

फिर आप को सच्चाई पर पा के उन लोगों ने आप के हाथ पर इस्लाम कुबूल किया । बाबा हुजूर ने उन्हें दीने इस्लाम की तालीम से अवगत कराया । 
उसके बाद तकरीबन और दो साल वहाँ रह कर उन सभी को सीधी राह दिखाई । जंगल ही में आप की रियाजत का सिलसिला जारी रहा । 

उसी दौरान लोगों ने आप को जंगल में शेर की सवारी करते हुए भी पाया । इस्लाम की दौलत से उन्हें मालामाल करने के बाद आप कामठी लौट आए ।



बाबा ताजुद्दीन Hazrat Baba Tajuddin Aulia की बस्तर से कामठी वापसी 


बस्तर से कामठी Bastar To Kamptee वापसी और फौजी मुलाज़ेमत जब आप कामठी तशरीफ लाए तो यहाँ के हालात बदल चुके थे । 
आप के खानदान के लोग आप को देख कर बहुत खुश हुए लेकिन नानाजान का इतकाल हो चुका था । उस वक्त आपकी उम्र मुबारक तकरीबन सतरा बरस हो चुकी थी । 

आपकी गैर मौजूदगी में कामठी की कन्हान नदी में जबरदस्त सैलाब आया था जिसकी वजह से कामठी के मकान और सारा सामान बह चुका था । जिन में आप के नानाजान का भी मकान था । 
आप के मामूजान जनाब शेख अब्दुर्रहमान इन हालात की वजह से परेशान से थे । बाबा हुजूर ने उन्हें तसल्ली दी । उनके लिए दुआ की । 

आपसी मशवरे से मामू - भांजे दोनों मुलाजेमत के लिए कोशिश में लग गए । अल्लाह ने मदद फरमाई और दोनों हजरात मुलाजेमत पेशा हो गए । 
मामूजान वनविभाग और बाबा हुजूर फौज में मुलाजिम हो गए । जब आप गोराबाज़ार रेजिमेन्ट आए , कमांडर इन चीफ को नौकरी के लिए अर्जी दी । कमांडर इन चीफ ने आपका कद काठी देख कर फौरन अर्जी कुबूल कर ली । 

इस तरह बाबा हुजूर को सन १८८१ में नागपूर की रेजिमेन्ट नं ८ में नाईक का ओहदा मिला । इत्तेफाक से मद्रासी पलटन में दाखिला मिला । इस वक्त आप की उम्र अठ्ठारह बरस थी । 

फौज के बड़े अफसर बाबा हुजूर की सादा जिन्दगी और सच्चाई से बहुत खुश और बेहद महेरबान रहा करते थे । पलटन का मुकाम कुछ अरसा कामठी में ही रहा । 
उसके बाद आपकी पलटन के दो हिस्से हुए । कुछ किताबों में बाबा हुजूर के विदेश जाने का भी जिक्र किया गया है । 

जैसे कि फ्रान्स , जर्मनी , अबीसीना वगैरह । वापसी में आप की पलटन का पड़ाव हैदराबाद दक्कन में निज़ाम हुकूमत के दौर में ग्रास फार्म नामक जगह पर हुआ । 
यह भी जिक्र मिलता है कि यहाँ पर बाबा हुजूर Baba Tajudin ने दो अंग्रेज अफसरों को कुरआन और रूहानियत की तालीम दी । 

यहाँ पर आप ने तकरीबन तीन महीने तक मुकाम किया । फिर वहीं से आपका आगमन सागर शरीफ में हुआ होगा क्योंकि सागर शरीफ Sagar Sharif में मुकाम के दौरान आपकी पलटन बाहर नहीं गई । जबकि कुछ किताबों में कामठी Kamptee  से सीधे सागर शरीफ आने का जिक्र किया गया है । 

हकीकत कुछ भी नहीं पड़ता । यह जरूर है कि सागर शरीफ ही से आप का दोबारा कामठी आगमन हुआ । यह वह दौर है जब बाबा हुजूर Baba Tajuddin अपने आप में नही रहते थे । 
यहाँ से आपके जीवन में जबरदस्त बदलाव आया । | इस से कुछ फर्क


सागर शरीफ में बाबा ताजुद्दीन Hazrat Baba Tajuddin Aulia

सागर शरीफ Sagar में हज़रत बाबा ताजुद्दीन Hazrat Baba Tajuddin ( रहमतुल्लाह अलैह ) का मुकाम तकरीबन तीन साल के अरसे पर फैला हुआ है । बाबा हुजूर सागर पहुंचे और फिर आप के जीवन में क्रांति आ गई । 
आप ने अपने जीवन कार्य को सिरे से संवारा । यहाँ भी मुलाजेमत के दौरान आप ने कड़ी रियाजत की । इंतेहाई मेहनत व मशक्कत से आपने अपने फर्ज़ अदा किए । आप का ज़ाहिर तो लोगों को मालूम था मगर अंदरून एक राज़ था ।

बाबा हुजूर को दरगाहों की जियारत से बहुत लगाव था । आप अक्सर मजारों पर ज़ियारतों को जाया करते थे । जब आप सागर पहुंचे तो वहाँ एक मशहूर बुजुर्ग हजरत सैयद दाऊद मक्की ( रहमतुल्लाह अलैह ) का मजार है वहाँ भी आप हाजिर हुए । 

उस समय आप की उम्र तकरीबन २१ बरस थी । 

आप रात के अंधेरे में हजरत दाऊद मक्की ( रहमतुल्लाह अलैह ) के मजारे मुबारक पीली पहाड़ी पर तशरीफ ले जाते और मुराकबे ( ध्यान ) में बैठ जाते । 

हजरत सैयद दाऊद मक्की जैसा कि आप के नाम से ज़ाहिर है आप का संबंध मक्का शरीफ ( अरब ) से है और आपने लंबी उम्र पाई । इन के एक साथी हजरत सैयद अजीज़ मक्की ( रहमतुल्लाह अलैह ) की मजार मुबारक पंजाब पाकिस्तान में है जो आप के हम सफर रहे थे । 

आप पंजाब पाकपटन ही में ठहर गए थे । इन्होंने भी लंबी उम्र पाई । इन नेक बंदों ने सत्यता के प्रचार के प्रति अपने वतन को अलविदा कहा । जीवन को त्यागा , तकलीफों और मुसीबतों को सहा और अपना बलिदान दिया । 

बाबा हुजूर ने भी इन बुजुर्गों की पैरवी की । जो व्यक्ति अल्लाह के रास्ते पर चलता है तकलीफें और मुसीबतें उसका पीछा नहीं छोड़ती जो दृढ रहा व कामयाब रहा । 
अल्लाह के पैगम्बर और औलिया इन ही राहों के राही रहे हैं । यह वह महान हस्तियाँ हैं जो अल्लाह तआला को बहुत ज्यादा पसंद है । 

इन के कारनामों ने दीन - ए - इस्लाम को इज्जत बख्शी है । यही कीर्तीमान है जिन्हें सही मायने में खलीफतुल अर्द होने का सम्मान प्राप्त है । 
ऐसी नेक और पवित्र हस्तियों का मिसाली चरित्र बाबा हुजूर के जीवन में लाभदायक साबित हुआ ।


दो साल की लगातार रियाज़त ने आप के सारे रास्ते खोल दिए । यही वह मुकाम है जहाँ आप को ओवैसिया तरीके से बहुत कुछ अता हुआ । 
हज़रत बाबा ताजुद्दीन Hazrat Baba Tajuddin Aulia बाकायदा दिन में ड्यूटी अंजाम देने के बाद रात को दरगाह हजरत दाऊद मक्की में ( रहमतुल्लाह अलैह ) हाजिर होते । 

रात भर कयाम के बाद सुबह को फिर ड्यूटी पर आ जाते । आप के साथियों ने जब देखा कि रात को आप लापता हो जाते हैं तो कामठी में आपकी नानीजान को खबर की । 
नानीजान का चिंता में मुवतेला होना स्वाभाविक था । नानीजान सागर Sagar तशरीफ लाईं और एक रात खामोशी से अपने नवासे के पीछे - पीछे दरगाह तक आई जब नानीजान ने आप को दरगाह के अंदर दाखिल होते देखा तो इतमिनान की सांस ली । 

आप की सारी चिंताएं दूर हो गई । आप समझ गईं कि उन का इकलौता लाडला नवासा अल्लाह वालों से रुजु हो रहा है । 
जाहिर में बाबा हुजूर ने अब तक नानीजान पर कुछ ज़ाहिर न किया था मगर दूसरे दिन सुबह को जब नानीजान ने आप को नाशता पेश किया तो आप ने करामत जाहिर कर दी । 

नाशता करने से आप ने इंकार कर दिया और हाथ की कंकरियाँ दिखाते हुए मुंह में डाल कर कहने लगे , ..हम तो यह लड्डू . पेड़े खाते हैं । ,, 
और उनके सामने यूं चबा - चबा कर खाए जैसे कोई मिठाई खाता है । नानीजान सकते में आ गई वह समझ गई कि नवासा क्या कहना चाहता है । नानीजान ने आप को दुआएं दीं और फिर कामठी चली आई । 

हजरत सरकार ताजुल औलिया अपनी रविश पर चलते रहे और आप की रियाजत में भी तेजी आ गई । एक रात जब आप दरगाह शरीफ में दाखिल हुए और मुराकबे ( ध्यान ) में बैठे तो

आप की मुराद पूरी हो गई । अल्लाह तआला की बारगाह में आप की गुजारिश कुबूल हो गई । अनवारे इलाही से नवाजे गए । हातिफे यी ने सदा दी . " मांग क्या मांगता है ! ' ' 

यह आवाज आप ने कई बार सुनी और आप ने आवाज पर लब्बैक कहते हुए , होशमदी से जवाब दिया , ..तेरी ही तलब है । , दुआ कुबूल हुई और हक आप पर आश्कार ( जाहिर ) हो गया ।
आसमानों में ऐलान हो गया कि आप अल्लाह के खास बंदे हैं । आप ने अल्लाह का शुक्र अदा किया और वहाँ से वापस चले आए । एक रात बाबा हुजूर ( रहमतुल्लाह अलैह ) की ड्यूटी हथियार खाने पर लगाई गई तो उस रात एक अजीब वाक्या हुआ । 

अग्रेज अफसर अचानक मुआयने पर आ गया और आप को ड्यूटी करते देख आगे बढ़ गया । जब वह थोड़ा और आगे गया तो बाबा हुजूर उसे नमाज अदा करते नजर आए । 
अंग्रेज़ अफसर को बहुत ताज्जुब हुआ वह वापस गोडाउन की तरफ आया देखा तो बाबा हुजूर नजर आए जब आप ने आगे बढ़ कर ' हॉल्ट ! ' कहा तो वह अंग्रेज अफसर हक्का - बक्का रह गया । उसे इतमिनान ना हुआ । 

वह दोबारा उस जगह आया तो फिर बाबा हुजूर Baba Tajudin उसे नमाज अदा करते नजर आए वह फिर हथियार खाने की तरफ लपका । इस बार भी बाबा हुज़ूर को हाजिर देखकर ठिठक गया । 
यह वाक्या उस अंग्रेज अफसर ने बड़े अफसर से दूसरे रोज उसके दफ्तर में बयान किया । बाबा हुजूर को तलब किया गया । उस अफसर का अंदाजे बयान कुछ यूं था , ' हम समझता है तुम खुदा का कोई खास बंदा है । 

कल हमने तुम्हें दो - दो जगह ड्यूटी करते देखा । ' ' यह सुनते ही हजरत बाबा ताजुद्दीन Hazrat Baba Tajuddin Aulia ( रहमतुल्लाह अलैह ) जलाल में आ गए और आपने अपना फौजी सामान लाकर उनके सामने रख दिया और फरमाया , " लो जी हजरत ! दो - दो नौकरियाँ नहीं करते । " 
यह कह कर आप फौरन वहाँ से बाहर आ गए । 

फिर वह थे और सागर की गलियाँ । जनाब बेग साहब ने सागर से नानीजान को खत लिख कर खबर दी कि बाबा हुजूर बेखुदी में सागर शरीफ की गलियों में नजर आते हैं । 

खबर मिलते ही नानी साहेबा फौरन सागर शरीफ Sagar Sharif पहुंची और बाबा हुजूर को अपने साथ कामठी Kamptee ले आई ।




चमत्कार (Miracles) Hazrat Baba Tajuddin Aulia


हजरत बाबा ताजुद्दीन ( रहमतुल्लाह अलैह ) से चमत्कारों का सिलसिला तो उनके बचपन ही से शुरु हो चुका था , लेकिन लोग समझने से वंचित रहे । बाबा हुजूर पैदाईशी वली हैं । 
जब बाबा हुजूर से अद्भुत चमत्कार होने लगे तो आपका चर्चा होने लगा । सागर शरीफ Sagar Sharif  में बाबा हुजूर एक ही समय में अपनी ड्यूटी और हज़रत दाऊद मक्की ( रहमतुल्लाह अलैह ) के मजार पर देखे गए । 

यह तयअर्ज ( जमीनी फासले को कम कर देना ) की खुली निशानी है । कोई जगह ऐसी नहीं जहाँ बाबा हुजूर के चमत्कार न हुए हों । चंद चमत्कार यहाँ लिखे जाते


खाना तो संदूक में है ! 

कामठी में बाबा हुजूर एक व्यक्ति के घर पहुंचे और उससे फरमाया कि खाना ला कर दे । उसने कहा कि खाना तो खत्म हो चुका । 
बाबा हुजूर ने फरमाया खाना तो संदूक में रखा है । उस व्यक्ति ने जाकर देखा तो खाना संदूक में रखा हुआ था । 
उसने फौरन खाना लाकर पेश किया और हैरत से आप को देखता रहा और आपका श्रध्दालु बन गया । । 

घर खाली कर दे 

कामठी में एक दिन बाबा हुजूर ( रहमतुल्लाह अलैह ) गश्त पर थे कि बदलू सुनार के घर पहुंचे और उससे कहा कि फौरन घर खाली कर दे । बदलू सुनार समझा कि ज़रूर यह कोई पहुंचे हुए बुजुर्ग मालूम होते हैं । 
उसने बाबा हुजूर Baba Tajuddin की बात पर अमल करते हुए अपना घर खाली कर दिया । उसी रात उसके घर आग लग गई और सारा सामान जल कर खाक हो गया । मगर कोई जानी नुकसान न हुआ । 
बाबा हुजूर की यह भविष्यवाणी चमत्कार से कम नहीं थी । उस दिन के बाद से बदलू सुनार का परिवार बाबा हुजूर का इंतहाई दीवाना और प्रध्दालु हो गया । - 


गिरता है तो गिर ताजुद्दीन तो है ! 

एक मद्रासी साहब कामठी में रहते थे । अक्सर रात में बाबा हुजूर ( रहमतुल्लाह अलैह ) उन साहब के यहाँ भोजन किया करते और मद्रासी भी बाबा हुजूर Baba Tajudin के इंतेजार में रहा करता था । 
बाबा हुजूर के बगैर वह भी निवाला नहीं उठाता था । एक रोज का वाक्या है कि वह मद्रासी साहब खाना पेश कर रहे थे , उसी समय बाबा हुजूर ने फरमाया , “ गिरता है तो गिर ताजुद्दीन तो है ! ' ' 
मद्रासी की समझ में कुछ नहीं आया । उसी रात जब मद्रासी का मकान बैठ गया और सारा सामान मलबे में दब गया तो मद्रासी को बाबा हुजूर की बात समझ आ गई । 

बाबा हुजूर के करम से कोई जानी नुकसान न हुआ था । उसी रोज़ से मद्रासी की नज़र में बाबा हुजूर की शान और बढ़ गई और आपकी मोहब्बत उस के दिल में घर कर गई । - 


ताजुद्दीन ने तुझे तीन बच्चे अता किए उन्हीं मद्रासी साहब ने एक रोज़ मौका देख कर हुजूर से कहा कि उस की कोई औलाद नहीं है । 
कुछ देर गौर करने के बाद बाबा हुजूर ने फरमाया , " ताजुद्दीन ने तुझे तीन बच्चे अता किए । ' ' यह सुन कर वह मद्रासी साहब बहुत खुश हुए । इसके बाद उन मद्रासी साहब के यहाँ तीन औलाद हुई । - 


मुकदमा जीत को आते 

कामठी में एक रोज बाबा हुजूर ( रहमतुल्लाह अलैह ) एक नाले के करीब बैठे हुए थे । एक मारवाड़ी वहाँ से गुजरा । आप उसे देखकर ज़ोर से हंसे और उस के सामने पेशाब कर दी । 

मारवाड़ी एक दम हैरत से देखने लगा , हुजूर ने उस से फरमाया , " अबे देखता क्या है , नालिश तो खारिज हो गई ! " मारवाड़ी हक्का - बक्का देखता रह गया । दरअसल , वह कचहरी जा रहा था 
क्योंकि उसके मुकदमे का फैसला होने वाला था और बाबा हुजूर ने अजीब अंदाज़ में भविष्यवाणी कर दी थी । इस कारण वह सोच विचार में था । 

जब वह कचहरी पहुंचा और हकीक़त में मुकदमे का फैसला उसके हक में हुआ तो उसे बाबा हुजूर के वली होने में जरा भी शक न हुआ । 
मारवाड़ी खुशी के मारे बाबा हुजूर से मिलने बेकरार था । वह मिठाई और बाजे - ताशे के साथ आपकी सेवा में आया । 

आप की सेवा में जब मारवाड़ी ने मिठाई पेश की तो आप ने फरमाया , " नको जी , बच्चों को खिलाते ! ' ' इस वाक्ये ने बाबा हुजूर की शान व चमत्कार का चर्चा चारों ओर कर दिया । - 


अच्छा हो जाएगा ! 

कामठी में मिस्टर ऑस्टिन नामी एक अंग्रेज अफसर थे । यह साहब लेफ्टेनेंट के पद पर कार्यरत थे । इन साहब का इकलौता बेटा एक पैर से अपाहिज हो चुका था । 

बहुत इलाज हुए मगर कोई फायदा न हुआ । आखिरकार लड़के की माँ ने बाबा हुजूर Baba Tajuddin की सेवा में हाज़िरी दी और लडके का हाल सुनाया । हुजूर ने उस लड़के के पैर पर अपना चमत्कारी हाथ फेरा और उसकी माँ से कहा , " अच्छा हो जाएगा । ' ' 

चंद दिनों में वह लड़का बिलकुल ठीक हो गया । जब अंग्रेज अफसर को मालूम हुआ कि लड़का बाबा हुजूर की दुआ से अच्छा हुआ है तो आपकी सेवा में है तो आपकी सेवा में बहुत अदब से हाजिर हुआ और श्रद्धा से चरण छूए । जनसेवा का यह जज़्बा हुजूर की खास आदतों में से एक है । 



बड़ा आदमी बनेगा 

हिन्दुस्तान के उपराष्ट्रपति जनाब जस्टिस हिदायत उल्लाह का जब कामठी Kamptee में जन्म हुआ तो बाबा हुजूर ( रहमतुल्लाह अलैह ) उनके घर तशरीफ लाए और उन के पिताजी से मुलाकात की । 
अपनी जली हुई बीड़ी दी और फरमाया , " तेरा नया मेहमान एक रोज़ बड़ा आदमी बनेगा । ' ' और ऐसा हुआ भी ! 
इस वाक्ये का जिक्र जस्टिस हिदायत उल्लाह ने अपनी जीवनी में भी किया है । 
न सिर्फ ये बल्कि आपने इस बात का उल्लेख भी किया है कि बाबा हुजूर की दी हुई वह बीड़ी उन्होंने आज भी संभाल कर रखी है । - 



दाल खाना खाते

कामठी के एक रहवासी मास्टर मुहम्मद हनीफ साहब अपनी पत्नी के बारे में बताते हैं कि बचपन में वह एक बार बहुत बीमार हा गई थी । 
जीवन की ज्योत बुझ रही थी । उनकी दादीजान ने उन को उसी हालत में सरकार ताजुल औलिया के क़दमों में डाला । 
बाबा हुजूर ने अपना मोहब्बत भरा हाथ उनके सिर पर फेरा और फरमाया , " अभी नहीं जाते , दाल खाना खाते और ठंडा पानी पीते , जिन्दा रहते । ' ' यह भविष्यवाणी सुन कर सद खुशी - खुशी घर लौटे । - 



हॉकी ब्रांड बीड़ी 

जनाब अब्दुल लतीफ साहब बहुत गरीबी की ज़िन्दगी गुजार रहे थे । एक दिन हुजूर की सेवा में हाज़िर होकर दिल ही दिल में दरख्वास्त की । 
बाबा हुजूर Hazrat Baba Tajuddin Aulia ने पेड़ का एक पत्ता उठाकर दे दिया । जनाब अब्दुल लतीफ साहब ने पत्ते से मुराद उसका कारोबार समझा और बिलकुल ठीक समझा । 
आपने बीड़ी के पत्तों का कारोबार शुरु कर दिया और बहुत प्रगति की ।

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