Sabr सब्र की इस्लाम में अहमियत बरकत और सब्र का माना In Hindi

sabr सब्र की तारीफ सब्र sabr के मा’ना हैं रोकना इस्तिलाह (काम) में काम्याबी की उम्मीद से मुसीबत पर बे क़रार न होने को सब्र कहते हैं । ....

Sabr सब्र की इस्लाम में अहमियत बरकत और सब्र का माना In Hindi


Sabr सब्र की इस्लाम में अहमियत बरकत और सब्र का माना In Hindi
Sabr

  • सब्र का मतलब Sabr meaning 

सब्र की तारीफ सब्र के मा’ना हैं  " रोकना " इस्तिलाह ( कोई काम )में काम्याबी की उम्मीद से मुसीबत पर बे क़रार न होने को सब्र कहते हैं । 

( तफ्सीरे नईमी , जि . 1 , स . 299 ) 


  • सब्र का मतलब Sabr meaning 

और सब्रे {Sabr} जमील येह है कि मुसीबत वाला दूसरों में पहचाना न जाए और इस तक लम्बे अर्से तक बहुत ज़ियादा इबादतो रियाज़त कर के पहुंचा जा सकता है । 

( लुबाबुल एहूया , स . 308 , मक्तबतुल मदीना )


  • Sabr Meaning In English

Patience is praised by patience. "Stop" Istillah (work) is called patience, not the absence of trouble with the hope of success.

(Tafsire Naim , Jil . 1 , 299)


  • Sabr Meaning In English

And Saber Jameel is that the person with trouble is not recognized by others and it can be reached for a long time by offering a lot of prayers.

(Lubabul Ehuya , S . 308 , Maktabul Madina)


“ सब ” {Sabr} के तीन हुरूफ़ की निस्बत से 3 फ़रामीने मुस्तफा 

( 1 ) तुम्हारे ना पसन्दीदा बात पर सब्र करने में खैरे कसीर ( या'नी बड़ी भलाई ) है । 

( 2 ) अल्लाह पाक (Allah Paak) फ़रमाता है : जब मैं अपने किसी बन्दे को उस के जिस्म , माल या औलाद के जरीए आजमाइश में मुब्तला करूं , फिर वोह सब्रे जमील के साथ उस का इस्तिक्बाल करे तो क़ियामत के दिन मुझे हया आएगी कि उस के लिये मीज़ान काइम करूं या उस का नामए आ'माल खोलूं । 

( 3 ) अल्लाह पाक फ़रमाता है : “ जब मैं अपने मोमिन बन्दे से उस की कोई दुन्यवी पसन्दीदा चीज़ ले लूं , फिर वोह सब्र {Sabr} करे तो मेरे पास उस की जज़ा जन्नत के सिवा कुछ नहीं ।


सब {Sabr} के तीन हुरूफकी निखत से सब के बारे में 3 हिकायात 

( 1 ) रिजाए मौला अज़ हमा औला सहाबी इन्ने सहाबी , जन्नती इब्ने जन्नती (Hazrate) हज़रते सय्यिदुना अब्दुल्लाह बिन उमर का एक बेटा बीमार हो गया तो आप को इस कदर गम हुवा कि बाज़ लोग यह कहने लगे : " हमें अन्देशा है कि इस लड़के के सबब इन के साथ कोई मुआमला न बन जाए । " फिर वोह लड़का फ़ौत हो गया । जब हज़रते सय्यिदुना अब्दुल्लाह बिन उमर  उस के जनाजे के साथ जा रहे थे तो बड़े खुश थे । आप से इस का सबब पूछा गया तो इर्शाद फ़रमाया : " मेरा गम सिर्फ उस पर शक्कत की वज्ह से था और जब अल्लाह पाक (Allah Paak) का हुक्म आ गया तो हम इस पर राजी हो गए ।


( 2 ) मुर्ग , गधा और कुत्ता हज़रते सय्यिदुना अबू उकाशा मसरूक कूफ़ी बयान फ़रमाते हैं कि एक शख्स जंगल में रहता था । उस के पास एक कुत्ता , एक गधा और एक मुर्ग था । मुर्ग घर वालों को नमाज़ के लिये जगाया करता था और गधे पर वोह पानी भर कर लाता और खेमे वगैरा लादा करता और कुत्ता उन की पहरेदारी करता था । एक दिन लोमड़ी आई और मुर्ग को पकड़ कर ले गई , घर वालों को इस बात का बहुत दुख हुवा मगर वोह शख्स नेक था तो उस ने कहा : " हो सकता है इसी में बेहतरी हो । " फिर एक दिन भेड़िया आया और गधे का पेट फाड़ कर उस को मार दिया इस पर भी घर वाले रन्जीदा हुए 

मगर उस शख्स ने कहा : " मुम्किन है इसी में भलाई हो । " फिर एक दिन कुत्ता भी मर गया तो उस शख्स ने फिर भी येही कहा : " मुम्किन है इसी में बेहतरी हो । " अभी कुछ दिन ही गुज़रे थे कि एक सुब्ह उन्हें पता चला कि उन के अतराफ़ में आबाद तमाम लोग कैद कर लिये गए हैं और सिर्फ इन का घर महफूज़ रहा है । (Hazrate) हज़रते सय्यिदुना मसरू  फ़रमाते हैं : दीगर तमाम लोग कुत्तों , गधों और मुर्गों की आवाज़ों की वज्ह से ही पकड़े गए । लिहाज़ा तक़दीरे इलाही के मुताबिक़ उन के हक़ में बेहतरी उन जानवरों की हलाकत में थी ।

( इमाम गज़ाली इस वाकिए को बयान फ़रमा कर लिखते हैं : जो अल्लाह पाक के छुपे हुए फलो करम को जान लेता है वोह हर हाल में उस के कामों पर राज़ी रहता है । ) 


( 3 ) सब से बड़ा इबादत गुज़ार 

अल्लाह पाक के ऐसे ऐसे साबिर बन्दे गुज़रे हैं जिन्हों ने मुसीबतों को इस तरह गले लगाया कि अल्लाह पाक से उन के टलने की दुआ करने को भी मकामे तस्लीमो रिज़ा के ख़िलाफ़जाना चुनान्चे 

हज़रते सय्यिदुना यूनुस ने हज़रते सय्यिदुना जिब्रईले अमीन से फ़रमाया : मैं रूए जमीन के सब से बड़े आबिद ( या'नी इबादत गुज़ार ) को देखना चाहता हूं । (Hazrate) हज़रते सय्यिदुना जिब्रईले अमीन आपको एक ऐसे शख्स के पास ले गए जिस  के हाथ पाउं जुज़ाम की वज्ह से गल कट कर जुदा हो चुके थे और वोह ज़बान से कह रहा था , या अल्लाह पाक ! तू ने जब तक चाहा इन आज़ा से मुझे फ़ाएदा बख़्शा और जब चाहा ले लिये और मेरी उम्मीद सिर्फ अपनी ज़ात में बाक़ी रखी , ऐ मेरे पैदा करने वाले ! मेरा तो मक्सूद बस तू ही तू है । 

हज़रते सय्यिदुना यूनुस ने फ़रमाया : ऐ जिब्रईले अमीन ! मैं ने आप को नमाजी , रोज़ादार शख्स दिखाने का कहा था । हज़रते सय्यिदुना 

जिब्रईले अमीन ने जवाब दिया : इस मुसीबत में मुब्तला होने से कब्ल येह ऐसा ही था , अब मुझे येह हुक्म मिला है कि इस की आंखें भी ले लूं । चुनान्चे 

हज़रते सय्यिदुना जिब्रईले अमीन ने इशारा किया और उस की आंखें निकल पड़ी ! मगर आबिद ने ज़बान से वोही बात कही : " या अल्लाह पाक (Allah Paak) ! जब तक तू ने चाहा इन आंखों से मुझे फाएदा बख्शा और जब चाहा इन्हें वापस ले लिया । ऐ अल्लाह पाक ! मेरी उम्मीद गाह सिर्फ अपनी ज़ात को रखा , मेरा तो मक्सूद बस तू ही तू है । " 

हज़रते सय्यिदुना जिब्रईले अमीन ने आबिद से फ़रमाया : आओ हम तुम मिल कर दुआ करें कि अल्लाह पाक तुम को फिर आंखें और हाथ पाउं लौटा दे और तुम पहले ही की तरह इबादत करने लगो । 

आबिद ने कहा : हरगिज़ नहीं । 

हज़रते सय्यिदुना जिब्रईले अमीन ने फ़रमाया : आख़िर क्यूं नहीं ? आबिद ने जवाब दिया : जब मेरे अल्लाह पाक की रिज़ा इसी में है तो मुझे सिहहत नहीं चाहिये । 

हज़रते सय्यिदुना यूनुस ने फ़रमाया : वाकेई मैं ने किसी और को इस से बढ़ कर आबिद नहीं देखा ।

हज़रते सय्यदुना जिब्रईले अमीन ने कहा : येह वोह रास्ता है कि रिज़ाए इलाही तक रसाई के लिये इस से बेहतर कोई राह नहीं । 


देखा आप ! साबिर हो तो ऐसा ! आखिर कौन सी मुसीबत ऐसी थी जो उन बुजुर्ग के वुजूद में न थी हत्ता कि बिल आखिर आंखों के चराग भी बुझा दिये गए मगर उन के सब्रो {Sabro} इस्तिक्लाल में ज़र्रा बराबर फ़र्क न आया , वोह “ राज़ी ब रिजाए इलाही " की उस अज़ीम मन्ज़िल पर फ़ाइज़ थे कि अल्लाह पाक से शिफ़ा तलब करने के लिये भी तय्यार नहीं थे कि जब अल्लाह पाक ने बीमार करना मन्जूर फ़रमाया है तो मैं तन्दुरुस्त होना नहीं चाहता ।

येह उन्हीं का हिस्सा था । ऐसे ही अहलुल्लाह का मकूला है हम बलाओं और मुसीबतों के मिलने पर ऐसे ही खुश होते हैं जैसे अहले दुन्या दुन्यवी ने'मतें हाथ आने पर खुश होते हैं । याद रहे ! मुसीबत बसा अवक़ात मोमिन के हक में रहमत हुवा करती है और सब्र कर के अज़ीम अन कमाने और बे हिसाब जन्नत में जाने का मौक़अ फ़राहम करती है । 

Sabr सब्र की इस्लाम में अहमियत बरकत और सब्र का माना In Hindi
Sabr

एक कांटे पर सब्र {Sabr}  का अज्र 

सहाबी इब्ने सहाबी , जन्नती इब्ने जन्नती हज़रते सय्यिदुना अब्दुल्लाह बिन अब्बास फ़रमाते हैं कि नविय्ये करीम ने इर्शाद फ़रमाया : जिस के माल या जान में मुसीबत आई फिर उस ने उसे पोशीदा ( या'नी छुपाए ) रखा और लोगों पर ज़ाहिर न : किया तो अल्लाह पाक (Allah Paak) पर हक़ है कि उस की मरिफरत फ़रमा दे ।  एक और रिवायत में है : मुसल्मान को मरज़ , परेशानी , रन्ज , अज़िय्यत और गम में से जो मुसीबत पहुंचती है यहां तक कि कांटा भी चुभता है तो अल्लाह पाक उसे उस के गुनाहों का कफ्फारा बना देता है । 


 हम आज़माएंगे {Sabr} In Quran

अल्लाह पाक कुरआने करीम में पारह 2 सूरए बक़रह आयत 155 में इर्शाद फ़रमाता 

Sabr सब्र की इस्लाम में अहमियत बरकत और सब्र का माना In Hindi

तरजमए कन्जुल ईमान : और ज़रूर हम तुम्हें आजमाएंगे कुछ डर और भूक से और कुछ मालों और जानों और फलों की कमी से और खुश खबरी सुना उन सब्र वालों को । Sabr In Quran


बिच्छू के काटने पर सब्र {Sabr} 

सिल्सिलए अत्तारिय्या कादिरिय्या के अजीम बुजुर्ग हज़रते सय्यिदुना सरी सकती से सब्र के बारे में पूछा गया तो आप ने सब्र से मुतअल्लिक बयान शुरूअ फ़रमा दिया । इसी दौरान एक बिच्छू आप की टांग पर मुसल्सल डंक मारता रहा लेकिन आप पुर सुकून रहे । आप से पूछा गया कि इस मूज़ी ( या'नी तक्लीफ़ देने वाले ) को हटाया क्यूं नहीं फ़रमाया : मुझे अल्लाह पाक (Allah Paak) से हया आ रही थी कि मैं सब्र का बयान करूं लेकिन खुद सब न करूं । 

सब्र करने वालों के सरदार जन्नती सहाबी (Hazrate) हज़रते सय्यिदुना अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद से मरवी है कि हज़रते सय्यदुना अय्यूब कियामत के दिन सब्र करने वालों के सरदार होंगे । 


रिज़्क़ के मुआमले में सब्र 

इमाम गज़ाली अपनी मुबारक ज़िन्दगी की सब से आखिरी किताब " मिन्हाजुल आबिदीन " में फ़रमाते हैं : ( अल्लाह पाक की इबादत से रोकने में मख्लूक के लिये ) सब से बड़ी रुकावट " रिज़्क " है लोगों ने इस के लिये अपनी जानों को थका दिया , इस की फ़िक्र में दिल इस क़दर पड़ गए कि अपनी उम्र जाएअ कर दी और इस की वज्ह से बड़े बड़े गुनाह करने से भी बाज न आए , रिज्क की फ़िक ने मख्लूक को अल्लाह पाक और उस की इबादत से दूर कर के दुन्या और मख्लूक की ख़िदमत में लगा दिया है 

लिहाजा दुन्या में इन्हों ने गफ्लत , नुक्सान और ज़िल्लतो रुस्वाई में ज़िन्दगी गुज़ारी और आख़िरत की तरफ़ ख़ाली हाथ चल पड़े ( हैं ) , अगर अल्लाह पाक ने अपने फज्ल से रहूम न फ़रमाया तो वहां इन्हें हिसाब और अज़ाब का सामना होगा । गौर तो करो कि अल्लाह पाक ने रिज्क के मुतअल्लिक कितनी आयात नाज़िल फ़रमाई और रिज्क देने पर कितना ज़ियादा अपने वा'दे , कसम और ज़मानत का ज़िक्र फ़रमाया , इस सब के बा वुजूद लोगों ने नेकी का रास्ता इख्तियार न किया और न ही मुत्मइन हुए बल्कि वोह रिज्क की वज्ह से मदहोशी की कैफ़िय्यत में हैं और इन्हें येही फ़िक्र खाए जाती है कि कहीं सुब्ह या रात का खाना निकल न जाए । 

( मिन्हाजुल आबिदीन ( उर्दू ) , स . 277 , मुलख्वसन तस्हीलन ) 


सब्र का आ'ला तरीन दरजा 

सब्र {Sabr} का आला तरीन दरजा येह है कि लोगों की तरफ़ से पहुंचने वाली तकालीफ़ पर सब किया जाए । अल्लाह पाक के आखिरी रसूल  ने इर्शाद फ़रमाया : " जो तुम से कृत्ए तअल्लुक करे उस से सिलए रेहमी से पेश आओ , जो तुम्हें महरूम करे उसे अता करो और जो तुम पर जुल्म करे उसे मुआफ़ करो । " और (Hazrate) हज़रते सय्यिदुना ईसा रूहुल्लाह ने इर्शाद फ़रमाया : " मैं तुम से कहता हूं कि बुराई का बदला बुराई से न दो ।


सब एक कड़वी दवा और ना पसन्दीदा चूंट है मगर है बहुत बरकत वाली शै , येह फ़ाएदे वाली चीज़ों को लाती और नुक्सान देह चीज़ों को तुम से दूर करती है और जब दवा ऐसी बेहतरीन हो तो अक्ल मन्द इन्सान खुद पर जबर दस्ती कर के इसे पी लेता और इस की कड़वाहट को बरदाश्त करता और कहता है : कड़वाहट एक लम्हे की और राहत साल भर की है । 

( इसी तरह ) जब अल्लाह पाक किसी वक्त तुम से दुन्या या रिज्क को रोक दे तो तुम कहो : ऐ नफ्स ! अल्लाह पाक तेरे हाल को तुझ से ज़ियादा जानता है और वोह तुझ पर सब से ज़ियादा मेहरबान भी है , जब वोह कुत्ते को घटिया होने के बा वुजूद रोजी देता है बल्कि काफ़िर को अपना दुश्मन होने के बा वुजूद खिलाता है तो मैं तो उस का बन्दा , उसे पहचानने और एक मानने वाला हूं तो क्या वोह मुझे एक रोटी भी नहीं दे सकता ? ऐनफ्स ! अच्छी तरह जान ले कि उस ने तुझ से रिज्क किसी बड़े फाएदे के लिये ही रोका है और अन्करीब अल्लाह पाक तंगी के बाद आसानी फ़रमाएगा पस थोड़ा सब्र कर ले फिर तू उस की आलीशान कुदरत के अजाइबात देखेगा ।


मौत की दुआ करना कैसा ? 

बाज़ लोग मुसीबत सर पर आ जाने पर मौत की दुआ मांगने लगते हैं बल्कि बाज़ नादान कर्जदार के बार बार तकाज़ा करने या दुन्यावी तालीम हासिल करने वाला तालिबे इल्म इम्तिहान में फेल हो जाने या बिज़नस में बहुत बड़ा नुक्सान हो जाने या पसन्द की जगह पर शादी न होने पर खुदकुशी कर लेते हैं । हरगिज़ कभी भी इस गुनाह की तरफ़ न जाइये , याद रखिये ! खुदकुशी गुनाहे कबीरा , हराम और जहन्नम में ले जाने वाला काम है । खुदकुशी करने वाले शायद येह समझते हैं कि हमारी जान छूट जाएगी ! 

हालां कि इस से जान छूटने के बजाए नाराज़िये रब्बुल इज्जत की सूरत में निहायत बुरी तरह फंस जाती है । खुदा की क़सम ! खुदकुशी का अज़ाब बरदाश्त नहीं हो सकेगा । रिजाए इलाही पर राजी रहिये सब्र {Sabr} कीजिये और अज्र कमाइये । और हां ! रन्जो मुसीबत से घबरा कर मौत की तमन्ना करना मम्नूअ है । हां शौके वस्ले इलाही ( या'नी अल्लाह पाक से मुलाकात ) सालिहीन ( या'नी नेक बन्दों ) से मिलने के इश्तियाक ( या'नी शौक ) दीनी नुक्सान या फ़ितने में पड़ने के खौफ़ से मौत की तमन्ना करना जाइज़ है । 


मौत की दुआ कब कर सकते हैं ? 

वालिदे आला हज़रत , अल्लामा मौलाना मुफ्ती नकी अली खान फ़रमाते हैं : जब दीन में फ़ितना देखे तो अपने मरने की दुआ जाइज़ है । 

( फ़ज़ाइले दुआ , स . 182 , मक्तवतुल मदीना )


" बहारे शरीअत " के मुसन्निफ़ , (Hazrate) हज़रते मुफ्ती मुहम्मद अमजद अली आ'ज़मी फ़रमाते हैं : मरने की आरजू करना और इस की दुआ मांगना मरूह है , जब कि किसी दुन्यवी तक्लीफ़ की वज्ह से हो , मसलन तंगी से बसरे अवक़ात होती है या दुश्मन का अन्देशा है माल जाने का ख़ौफ़ है और अगर येह बातें न हों बल्कि लोगों की हालतें ख़राब हो गई मा'सियत में मुब्तला हैं , इसे भी अन्देशा है कि गुनाह में पड़ जाएगा तो आरजूए मौत मरूह नहीं । ( बहारे शरीअत , 3/658 ) हदीसे पाक में है : तुम में से कोई मौत की आरजू न करे मगर जब कि नेकी करने पर ए'तिमाद न रखता हो । 

हुजूरे अक्दस से मन्कूल है  या'नी ऐ अल्लाह पाक (Allah Paak) ! जब तू किसी क़ौम के साथ अज़ाब व गुमराही का इरादा फ़रमाए तो ( उन के बुरे आ'माल के सबब ) मुझे बिगैर फ़ितने के अपनी तरफ़ उठा । 

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